समानता ✨
जन्म तुमने लिया और मैंने भी,
परिभाषित किया समाज ने तुम्हें भी मुझे भी।
समय के किस कालखंड में यह परिभाषा बैठी,
लड़का लड़की के भेद की सीमा बैठी।
पढ़ा - लिखा कर आजादी दी मुझे, तुम्हे भी,
पर थोड़ा कम।
अपनत्व ज्यादा मिला मुझे, तुम्हे भी,
पर थोड़ा कम।
मान्यता श्रेष्ठ होने की मिली मुझे, तुम्हे भी,
पर थोड़ा कम।
थोड़ा कम - थोड़ा कम की परंपरा से जब मन खिन्न हो उठा,
स्थान,समय, जन्म एक प्रक्रिया से, फिर ये भेद क्यों ?
ये प्रश्न उठा।
ये भेद ये सीमाएं बनाई होगी क्या?
जन्मदाता ने,
किसी को कम किसी को ज्यादा उत्कृष्टा की संभावना दी होगी क्या?
जन्मदाता ने।
थोड़ा कम, थोड़ी सीमाएं करके तुम्हे (लड़की)क्या मिला?
मिला उस समाज को जिसने इस परंपरा का श्री गणेश किया।
होगा स्वार्थ किसी का किसी को दबाने में,
होगा स्वार्थ अपनी गलती को सत्य बताने में।
कम-कम जब दबाव तीव्र होता हैं,
तभी समय की धारा में बदलाव होता हैं।
ख़ुद को किसी का स्वामित्व समझने वाले, समानता का पहर लाना होगा,
अन्यथा
परिवर्तन में स्वामित्व झुका किसी और के हाथ तब भी परिणाम अलग न होगा।
जब तक किसी में भी स्वामित्व की भावना होगी,
कठिन परिश्रम के बाद भी समानता न होगी।
समानता के लिए प्रतिपल समान होना आवश्यक हैं,
थोड़ा कम - थोड़ा कम की भावना का खंडन होना आवश्यक हैं।
-कपिल तिवारी "यथार्थ"