Hindi Quote in Poem by Kapil Tiwari

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अस्तित्व का व्यापार ✨

मेरी गुड़िया, परी, चिरैया—
समाज ने गढ़े हैं ये तमाम नाम।
नामकरण की इस प्रक्रिया से,
भूल की उसने तुम्हारे अस्तित्व का अधिपति बनने की।

रचा गया इसी नामकरण से झूठे प्रेम का प्रथम अध्याय,
और बुनी गईं वे मुखौटा-युक्त कहानियाँ—
सुशील, शांत और ‘चरित्रवान’ होने की।

समाज बना पहला ‘चोर-पहरेदार’,
जिसने सिखाया—अकेली रहो, दूर रहो, उन सबसे जो अनजान हैं।
जबकि वे पहरेदार स्वयं...
तुम्हारी सुशीलता और शांति का लाभ लेते रहे।

पहरेदारों का यह मुखौटा बना रहे,
इसलिए वे तुम्हें एक अनजान को सौंप आए।
एक ऐसा ‘अनजान’, जहाँ न प्रेम है, न बोध, न ज्ञान।

यदि पहरेदार यह आयोजित विवाह न रचाते,
न होता इसमें वह व्यापारिक लेन-देन;
न होता पहरेदारों के कानून में विवाह का अर्थ—शारीरिक संबंध,
तो क्या फिर कोई विवाह हो पाता?

क्या विवाह के नाम पर यह संभोग बाध्य हो पाता?
क्योंकि प्रेम के मार्ग से किसी के अंतर्मन तक पहुँचना,
साधारण नहीं है।
प्रेम से, स्त्री-पुरुष के शरीर तक की यात्रा, सुलभ नहीं है।

पर पहरेदारों ने एक चाल चली,
और शरीर तक पहुँचना... बहुत आसान कर दिया।
आयोजित विवाह !

- कपिल तिवारी "यथार्थ"

Hindi Poem by Kapil Tiwari : 112023184
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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