Hindi Quote in Poem by Kapil Tiwari

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अस्तित्व का व्यापार ✨

मेरी गुड़िया, परी, चिरैया—
समाज ने गढ़े हैं ये तमाम नाम।
नामकरण की इस प्रक्रिया से,
भूल की उसने तुम्हारे अस्तित्व का अधिपति बनने की।

रचा गया इसी नामकरण से झूठे प्रेम का प्रथम अध्याय,
और बुनी गईं वे मुखौटा-युक्त कहानियाँ—
सुशील, शांत और ‘चरित्रवान’ होने की।

समाज बना पहला ‘चोर-पहरेदार’,
जिसने सिखाया—अकेली रहो, दूर रहो, उन सबसे जो अनजान हैं।
जबकि वे पहरेदार स्वयं...
तुम्हारी सुशीलता और शांति का लाभ लेते रहे।

पहरेदारों का यह मुखौटा बना रहे,
इसलिए वे तुम्हें एक अनजान को सौंप आए।
एक ऐसा ‘अनजान’, जहाँ न प्रेम है, न बोध, न ज्ञान।

यदि पहरेदार यह आयोजित विवाह न रचाते,
न होता इसमें वह व्यापारिक लेन-देन;
न होता पहरेदारों के कानून में विवाह का अर्थ—शारीरिक संबंध,
तो क्या फिर कोई विवाह हो पाता?

क्या विवाह के नाम पर यह संभोग बाध्य हो पाता?
क्योंकि प्रेम के मार्ग से किसी के अंतर्मन तक पहुँचना,
साधारण नहीं है।
प्रेम से, स्त्री-पुरुष के शरीर तक की यात्रा, सुलभ नहीं है।

पर पहरेदारों ने एक चाल चली,
और शरीर तक पहुँचना... बहुत आसान कर दिया।
आयोजित विवाह !

- कपिल तिवारी "यथार्थ"

Hindi Poem by Kapil Tiwari : 112023184
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