जब मैं खुश था
वह नाराज थी,
जब वह खुश थी
मैं नाराज था।
ऐसे ही जीवन
चढ़ता रहा,
मौसम का दिया
चखता रहा।
याद है टूटी हड्डी
चलते हाथ,
मथा हुआ दही
उबलता हुआ दूध।
हाथ से पथती रोटियां
अन्न की खुशबू,
चित्त में बैठा हुआ
आने वाला अकेलापन।
जीवन में हाहाकार
तब भी था,
अब भी है,
नाराजगी तब भी थी
अब भी है,
इसी नाराजगी में
नटखट खुशी जिन्दा है।
*** महेश रौतेला