एक उम्र के बाद इंसान की तमाम ख्वाहिशें मर जाती हैं।
न कोई सपना बचा होता है, न ही किसी से कोई शिकायत।
अब तो बस जिंदगी है, जो 'कट' रही है,
किसी के आने का इंतज़ार नहीं, बस खुद से मिलने की तन्हाई बाकी है।"
कभी सोचा है, वो पड़ाव कैसा होता है जहाँ उम्मीदें दम तोड़ देती हैं और इंसान सिर्फ एक दर्शक बनकर अपनी जिंदगी को गुजरते देखता है? न दौड़ है, न भाग है, बस एक गहरी खामोशी है। क्या आप भी इस पड़ाव को समझ पा रहे हैं, या अभी भी कहीं भाग रहे हैं? अपने अनुभव लिखें। 🍂
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