3.. रावल जैत्रसिंह (शासनकाल: 1213–1253 ईस्वी)।
इल्तुतमिश के अहंकार का मर्दन और भूताला का युद्ध
यह वह दौर था जब दिल्ली सल्तनत का सुल्तान इल्तुतमिश अपनी अजेय सेना के घमंड में चूर था। वह संपूर्ण भारत पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़े थे मेवाड़ के शासक रावल जैत्रसिंह। जब इल्तुतमिश ने मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा पर हमला कर उसे तहस-नहस किया, तब रावल जैत्रसिंह ने पीछे हटने के बजाय धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाई।
गोगुंदा के पास ऐतिहासिक 'भूताला के युद्ध' में रावल जैत्रसिंह ने अपनी कुशल युद्धनीति और अदम्य साहस का परिचय देते हुए इल्तुतमिश की विशाल तुर्क सेना को इस कदर काटा कि दिल्ली के सुल्तान को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। इस युद्ध में मेवाड़ के वीरों ने न केवल तुर्कों के अहंकार को कुचला, बल्कि सदियों तक के लिए दिल्ली सल्तनत को हिलाकर रख दिया।
तुर्कों द्वारा नागदा को नष्ट किए जाने के बाद, रावल जैत्रसिंह ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। उन्होंने सामरिक दृष्टि से बेहद सुरक्षित और अभेद्य चित्तौड़गढ़ दुर्ग को मेवाड़ की नई राजधानी बनाया। उनके इस एक फैसले ने आने वाली सदियों के लिए मेवाड़ को प्रतिरोध का सबसे बड़ा केंद्र बना दिया। उन्हीं की तैयार की हुई इस मजबूत नींव पर आगे चलकर रावल रतन सिंह, महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ धर्मयुद्ध जारी रखा।
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