"अब न जीत, न हार"
अब न कोई आरज़ू है बाकी, न किसी का है इन्तेज़ार।
हम ज़िन्दगी के उस दौर में आ गए हैं यार...
जहाँ दूर-दूर तक फैला है बस सुकूँ भरा नज़ारा,
न पाने की कोई हसरत बची, न खोने का मलाल।
बद्दुआएं भी अब असर नहीं करतीं हम पर,
और न काम आती है किसी की दुआ भी...
शायद किस्मत के इस खेल से आगे, बहुत आगे हैं हम,
अब न जीत की खुशी मनाते, और अब न हार की परवाह करते हैं हम।
-MASHAALLHA