प्रेम और प्रतिशोध
यह सृष्टि एक कहानी है पुरानी,
जहाँ पे प्यार और नफ़रत का मेला।
कभी है मोम सी चाहत दीवानी,
कभी प्रतिशोध का चलता है खेला।
जहाँ ज़हरीले काँटे उग रहे हैं,
वहीं पर फूल भी कलियाँ खिलाता।
दिलों में घाव जो गहरे रहे हैं,
उन्हें फिर वक़्त का मरहम सुहाता।
न मिटती है मोहब्बत इस जहाँ से,
न नफ़रत का कभी अंत होता,
उलझती ज़िन्दगी हर एक यहाँ से,
कोई हँसता यहाँ, कोई है रोता।
इसी ताने-बाने में जग है चलता,
जहाँ हर रोज़ नया सूरज निकलता।