"प्रेम: पाना या तपना?"
मैं सोचती हूँ... प्रेम क्या है?
पा लेना?
या उसकी चाह में खुद को जला देना?
सूरज से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
रोशनी से, जो उसी की है...
या अँधेरे से,
जिसकी एक झलक पाने को
वो पूरा दिन आसमान में तपता है?
चाँद से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
अँधेरे से, जो उसका घर है...
या रोशनी से,
जिसे चुरा कर लाने को
वो पूरी रात दर्द में चमकता है?
नदी से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
अपनी लहर से, जो उसी का नाच है...
या समुंदर से,
जिसमें मिलने की आस में
वो हर रोज़ पत्थर से टकराती है,
रास्ता भटकती है,
पर रुकती नहीं?
शायद प्रेम पा लेना नहीं...
शायद प्रेम है
किसी एक झलक के लिए,
किसी एक मिलन के लिए,
उम्र भर तपते रहना,
चमकते रहना,
बहते रहना।
और अगर मिल भी जाए...
तो क्या सूरज अँधेरे में बसा रहता है?
क्या चाँद रोशनी को क़ैद कर लेता है?
क्या नदी समुंदर होकर बहना भूल जाती है?
नहीं।
प्रेम पाने का नाम नहीं।
प्रेम उस आग का नाम है
जो बुझती नहीं... मिल जाने पर भी।
प्राची तंवर ……