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"मैं ऐसी ही हूँ" मैं उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ दिल का लगना लाज़मी है मुझे। हक़ीक़त में जीना सीखा ही नहीं मेरा लगाव जो है, थोड़ा कागज़ी है मुझे। मैं नहीं चाहती मेरी उँगलियों में हीरा सजा हो कोई। उठाकर घास का तिनका, उम्र भर का वादा पहनाए मुझे बस इतना काफ़ी है। महँगे तोहफ़े, बड़ी-बड़ी बातें, इन सबसे मेरा कोई लगाव नहीं। अपने हाथों से ख़त लिखकर, पढ़े कोई मेरे लिए इससे बड़ी सौगात नहीं कोई। हाँ, मैं ऐसी ही हूँ थोड़ा बचपन, थोड़ी ज़िद हूँ। न दुनिया जैसी, न दुनिया से अलग, बस अपने जैसी हूँ। मुझे तारे तोड़कर लाने वाले नहीं चाहिए। मेरे साथ बैठकर तारों को देखने वाला चाहिए। बड़े-बड़े वादे नहीं, एक छोटा सा भरोसा चाहिए जहाँ मैं बिन डरे ख़ुद को रख सकूँ। तो आना, अगर आ सको तो ख़ाली हाथ आना। बस एक कागज़, एक कलम, और साथ रहने का सच्चा इरादा लाना। प्राची तंवर …..
जूठ क्या है? मैं सोचती हूँ, जूठ क्या है... कब, क्यों, कौन बोलता है ये जूठ? सब हक़ीक़त के आँचल में जीना चाहते हैं, फिर भी होंठों पर क्यों पलता है ये जूठ? शायद ये वो बच्चा है, जिसे हर बात पर डाँटा गया, सुना कभी गया ही नहीं तो चुप रहने के डर से उसने बोल दिया जूठ। शायद ये वो लड़की है, जिसके सपनों पर ज़माने ने पहरे बिठा दिए, रिवाज़ों की बेड़ियों से डरकर, उसने मुस्कुराकर कह दिया जूठ। या शायद ये वो लड़का है, जिसके कंधे ज़िम्मेदारियों से झुक गए, "मैं ठीक हूँ" का बोझ उठाते-उठाते, उसने थक कर बोल दिया जूठ। तो क्या जूठ सच में जूठ है? या बस एक ज़ख़्म है, जो सच बोलने से डरता है... या एक ख़्वाब है, जिसे दुनिया की नज़र लग जाती है? शायद जूठ, जूठ नहीं है वो बस एक पर्दा है, जिसके पीछे कोई सच साँसें गिन रहा है। वो एक मजबूरी है, जो सच्चाई की क़ीमत चुका नहीं पाती। वो एक दुआ है, जो होंठों से उतरकर दिल में ही रह जाती है। तो अगली बार कोई जूठ बोले, उसे परखने से पहले, उसकी ख़ामोशी को सुन लेना... क्योंकि हर जूठ के पीछे, एक अधूरा सच बैठा रोता है। प्राची तंवर …..
"ज़िंदगी: एक किताब" बैठे-बैठे आज मैं अपनी किताब के पन्ने पलट रही थी... कुछ समझ आया तो आगे बढ़ी, न आया तो फिर समझने को उन्हीं पन्नों को उलट रही थी... तभी दिल में एक ख़याल आया क्या जीवन भी एक किताब है? जिसे पढ़ने के लिए आगे बढ़ना पड़ता है... और बढ़ जाएँ आगे, तो समझने को कभी-कभी पीछे मुड़ना पड़ता है... फिर सोचा, ये जो स्याही है इन पन्नों पर, ये किस की निशानी है? क्या ये मेरे ही अश्क़ हैं जो लफ़्ज़ बन गए? या वक़्त ने अपने हाथों से लिखी कोई कहानी है? कुछ पन्ने हवा के झोंके से खुद ही पलट जाते हैं, कुछ को ज़बरदस्ती मोड़ना पड़ता है। कुछ पर उँगली फिसल जाती है, कुछ पर रूह अटक जाती है। हर अध्याय में एक रिश्ता है, कोई पहला प्रेम, कोई आख़िरी अलविदा। कुछ पन्ने फट गए, कुछ जले हुए हैं, पर सबसे खूबसूरत वही हैं जिन पर अब भी मेरी उँगलियों के निशान हैं। और आख़िर में समझा... मैं हूँ इस किताब की लेखिका। पर सब पन्ने मेरे लिखे नहीं। कुछ तक़दीर ने लिखे, कुछ लोगों ने, कुछ उन लम्हों ने जो लौट कर नहीं आएँगे। फिर भी रोज़ सुबह एक नया पन्ना खुल जाता है, कोरा, बिना स्याही के। और क़लम मेरे हाथ में है | प्राची तंवर….
“दाग़ और रोशनी”……. रात की चादर ओढ़े, छज्जे पे खड़ी थी, दूर आसमान पर तन्हा चाँद को तक रही थी... मन ने चुपके से पूछा उजालों से भरा जहाँ छोड़ कर, तूने ये अँधेरों का देस क्यों चुना, चाँद? क्या किसी अपने ने तेरा आसमान छीना होगा? जिस रात तुझे हौसले की बाँहों की ज़रूरत थी, क्या तुझे वहीं अकेला तोड़ दिया होगा? तब मेरी नज़र तेरे चेहरे के दाग़ों पे ठहर गई... इतना नूरानी, चमकीला , दूध सा उजला है तू, फिर तेरे दामन पर ये निशान किसने रख दिए? शायद तूने भी किसी से हद से ज़्यादा इश्क़ किया होगा, अपनी सारी चाँदनी उसकी हथेली पर रख दी होगी। और उसने जब अँधेरा लौटाया, तू ख़ामोश हो कर फ़लक के कोने में जा बैठा होगा। ये दाग़ तेरे ज़ख़्म नहीं, तेरी वफ़ा की लकीरें हैं, हर उस वादे का सबूत जो निभाया नहीं गया, हर उस साथ की याद जो अधूरा रह गया। फिर भी देखो... दाग़ों के बावजूद तू पूरा है, टूट कर भी दुनिया की रातें सँवारता है। तब समझी मैं... चाँद सबका इसीलिए है, क्योंकि उसने अपना दर्द छुपाया नहीं उसे रोशनी में बदल कर बाँट दिया। और मैं? मैं भी थोड़ी चाँद हूँ, माँ। दाग़ों के साथ ही सही, पर मुस्कुराती हूँ। किताबों की रोशनी से अपनी रात सजाती हूँ, और उम्मीद है, किसी और की रात भी। प्राची तंवर……
"घर" मैं कहती हूँ, घर को घर रहने दो... न बनाओ उसे दिखावे का महल, न सोने-चाँदी की दीवारों का भ्रम। घर तो बस घर होता है एक सुकून, एक थकान मिटाती शाम। पर उसे घर बनाने के लिए चाहिए होते हैं कुछ अपने, कुछ अधूरे से सपने, जो मिल-जुल कर पूरे होते हैं चाय की चुस्कियों और बेवजह की हँसी में। घर की दीवारों को चमकदार रंगों से ज़्यादा भाती हैं मुस्कुराहटें, जो बिना वजह ही फूट पड़ती हैं। चौखट को संगमरमर की नहीं, इंतज़ार करती आँखों की ज़रूरत होती है, और लौट कर आने वाले कदमों की आहट की। हर कोने में शीशे की मूरत न सही, न ही फ़र्श पे बिछा हो महँगा कालीन, पर दिल तो शीशे सा साफ़ हो, जिसमें अपना अक्स ढूँढने से भी डर न लगे। और उसमें बसे स्नेह का उजाला हो जो अँधेरी रातों में भी रास्ता दिखा दे। रसोई से आती सौंधी खुशबू, आँगन में सूखते रिश्तों के कपड़े, किताबों के बीच दबे ख़त, और तकिये के नीचे छुपे राज़ इन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों से बनता है घर। घर कोई चकाचौंध का तमाशा नहीं, न ही लोगों को दिखाने की तस्वीर। ये मंदिर है अपनों के आदर्शों का, जहाँ माफ़ी रहती है, जहाँ गिले-शिकवे भी गले लग जाते हैं। प्यार से गुँधा, यादों से सँवारा, और दुआओं से महका हुआ। प्राची तंवर
"खो जाऊं अगर मैं"….. अगर कभी मैं खो जाऊं, क्या मुझे कोई ढूंढने आएगा? लाखों की भीड़ में, घबराती हुई आवाज़ से, नम आंखों से, मेरा नाम लेकर, कोई मुझे बुलाएगा? या मैं यूं ही भटकती रहूंगी अनजान गलियों में, जहाँ न कोई रास्ता अपना हो, न कोई दीवार पहचानी। जहाँ हर मोड़ पर मैं खुद से ही पूछूं “क्या मैं यहीं तक थी? या अभी और भटकना बाकी है?” क्या कोई मेरी खामोशी की ज़मीन पर पैरों के निशान पढ़ पाएगा? क्या कोई मेरी थकी हुई सांसों की गर्द हवा से बटोर कर, मुझे पहचान पाएगा? क्या कोई इतना ठहरा हुआ होगा, जो मेरे न होने को भी महसूस कर ले? जो भीड़ के शोर में भी सिर्फ मेरी एक कमी को सुन ले? या मैं बस एक भूली हुई दुआ की तरह किसी ना-खुली किताब के पन्ने में दबी रह जाऊंगी... बिना पढ़े, बिना मिले? अगर कभी मैं खो जाऊं... क्या कोई मेरे कदमों की आहट से मुझ तक पहुंच पाएगा? प्राची तंवर….
"अगर बदलना होता" किसी ने पूछा मुझसे यूँ ही, ख़यालों-ख़यालों में, "अगर तुम कुछ बदलना चाहो, तो क्या बदलोगी?" सवाल ख़याली था, पर मैं सच मान बैठी। चली गई पूछने उनसे, जो मैं कभी थी। जो मैं अब हूँ। जो मैं बन जाऊँगी। पहले पूछा उस छोटी बच्ची से, जो मिट्टी में घर बनाती थी, जो तारों को मुट्ठी में भरना चाहती थी। वो हँस कर बोली, "मैं दुनिया बदल दूँगी, ताकि कोई गुड़िया कभी न टूटे, ताकि कोई परीकथा अधूरी न छूटे। मैं? मैं ठीक हूँ।" फिर पूछा उस लड़की से, जिसके हाथों में किताबें थीं, आँखों में सपने, और दिल में डर। वो चुप रही देर तक, फिर धीरे से बोली, "मैं ये डर बदल दूँगी, ये लोगों का क्या कहेंगे। ये पैरों की बेड़ियाँ। खुद को? खुद को बस उड़ना सिखाना है।" आख़िर में गई उस बूढ़ी औरत के पास, जिसके बालों में चाँदी थी, और आँखों में पूरी सदी। उसने मेरा हाथ थामा, और मुस्कुराकर कहा, "बेटा, बदलना क्या है? मैं तो हर दिन बदली। बच्चे के लिए, घर के लिए, ज़माने के लिए। अगर आज कुछ बदलना होता, तो मैं वो सारे पल वापस ले आती, जिनमें मैंने खुद को पीछे छोड़ दिया। मैं खुद को नहीं बदलती। बस खुद को जीना सीख लेती।" लौट आई मैं, सवाल वही था, पर जवाब बदल गया था। अब अगर कोई पूछे, "अगर तुम कुछ बदलना चाहो..." तो मैं कहूँगी, "मैं कुछ नहीं बदलूँगी। बस खुद को माफ़ कर दूँगी, हर उस बार के लिए, जब मैंने खुद से कहा था 'तुझे बदलना होगा'।" प्राची तंवर
नदी के किनारे नदी के किनारे बैठी, शीतल जल के दर्पण में खुद को निहारा करती थी। आते-जाते लोगों से, दुनिया की सारी चकाचौंध से, वह अक्सर किनारा करती थी। दर्पण में झाँकते हुए वह उन जुल्फ़ों को देखा करती, जिन्हें कभी किसी ने अपने हाथों से संवारा नहीं था। उन नम, थकी आँखों को, जिन्हें कभी काजल ने भी अपना घर नहीं माना था। पास पड़े एक सूखे पत्ते को उसने धीरे से उठाया, और नदी की नमी से मिलाया। अब वह पत्ता वैसा कठोर न था, उसमें कुछ कोमलता लौट आई थी थोड़ा-सा टूटा, थोड़ा-सा नम, मगर पहले जैसा नहीं। धीरे-धीरे सूरज ढल रहा था, मानो रोशनी और अँधेरा एक-दूसरे से गले मिल रहे हों। और वह सोचने लगी क्या वह सचमुच सिर्फ़ एक दर्पण था? या फिर कोई दिल, जो बरसों की वीरानी के बाद एक नई रोशनी की प्रतीक्षा में चुपचाप जल रहा था। क्योंकि कभी-कभी, दर्पण चेहरा नहीं दिखाते वे हमारी अधूरी कहानियाँ दिखाते हैं।
तुम क्या चाहती हो? मुझसे कभी पूछा ही नहीं गया, "बोल, तू क्या चाहती है?" क्यों मेरी ज़िंदगी के फैसले, हमेशा दूसरे ही बनाते हैं? सपने तो मेरे हैं, फिर भी किसी और के हाथों बुनते हैं। मैं बस देखती रहती हूँ खुद से पूछती हूँ, "आखिर तू क्या चाहती है?" हाँ, अगर सच में चाहने दिया जाए... तो सुनो, मुझे क्या पसंद है मुझे पानी की लहरों सा बहना पसंद है, हर तालाब, हर नदी, हर समंदर की गहराई को छूना पसंद है। मुझे सूरज की किरणों सा चमकना पसंद है, हर गली, हर गाँव, हर शहर के अंधेरों से गुज़रना पसंद है। मुझे टूटे सपनों को सीना पसंद है, हर दर्द, हर दीवार, हर "ना-मुमकिन" को जीत में बदलना पसंद है। बस इतनी सी ख्वाहिश है मेरी, कोई बड़ी बात नहीं मुझे बस... मैं रहना पसंद है। वोही जो मैं हूँ, वही बने रहना पसंद है। प्राची तंवर
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