ख़ामोश जवाब……
ज़रूरी नहीं हर सवाल का जवाब हो...
कोई जवाब न होना भी जवाब हो सकता है।
और अगर तुम पूछो कि "कहाँ तक जाना है?"
तो मैं फिर चुप हो जाऊँगी।
क्योंकि कुछ मंज़िलों के नाम नहीं होते,
बस एक एहसास होता है
कि रुकना नहीं है।
मैंने सपनों को अब ताले में नहीं रखा,
ना दीवारों पर टाँगा है।
मैंने उन्हें अपनी थकान में बोया है,
अपनी नींद में सींचा है।
वो अब दिखते नहीं,
पर उगते ज़रूर हैं
हर उस सुबह में,
जब मैं गिर कर भी उठ जाती हूँ।
लोग कहते हैं “बड़ा सोचो",
मैं कहती हूँ "सच्चा सोचो"
क्योंकि बड़े सपने अक्सर दुनिया के लिए होते हैं,
और सच्चे सपने... सिर्फ़ अपने लिए।
तो मेरा जवाब यही है
कि मैं जवाब नहीं दूँगी।
मैं बस चलती रहूँगी,
उस रास्ते पर जो अनजान है,
उन पैरों से जो थके हैं,
उस उम्मीद से जो ज़िद्दी है।
एक दिन जब पहुँच जाऊँगी,
तो तुम ख़ुद देख लेना...
मेरी ख़ामोशी क्या कह रही थी।
क्योंकि कुछ कहानियाँ
सुनाई नहीं जातीं,
वो एक रोज़ सब को ख़ुद सुन जाती है ।
प्राची गुर्जर …..