“मुझे पसंद है टूटना..."
मुझे पसंद है खिड़की का वो कोना,
जहाँ धूप आती है, पर रुकती नहीं।
बस मेरे कंधे को छूकर चली जाती है,
जैसे कोई पुराना खत पढ़कर रख दिया हो।
मुझे पसंद है अधूरे काम,
मेज़ पर बिखरी हुई किताब,
आधा लिखा हुआ कागज़,
कलम की खुली हुई टोपी।
बताते हैं कि मैं अभी ज़िंदा हूँ,
कि अभी कुछ बाकी है।
मुझे पसंद है बारिश के बाद की मिट्टी,
जो कुछ नहीं बोलती,
बस साँस लेती है।
और मैं उसके साथ साँस लेती हूँ।
मुझे पसंद है अपने हाथों को देखना,
इनमें लकीरें कम, कहानियाँ ज़्यादा हैं।
कहीं चाय का दाग, कहीं कलम की स्याही,
सब सबूत हैं कि मैंने जीने में कंजूसी नहीं की।
लोग कहते हैं मैं खोई रहती हूँ,
मैं कहती हूँ मैं मिली हुई हूँ।
खुद से, इस पल से, इस सांस से।
मुझे पसंद है टूटना,
क्योंकि टूटने के बाद ही पता चलता है
कि मैं कितनी मज़बूत थी।
प्राची गुर्जर …….