साया-ए-वफ़ा (तेरी ख़ामोश मोहब्बत)
तेरी नाराज़गी की इस उदास रात में,
मैं बनकर बहूँगा तेरे अश्कों के साथ में।
जो कह भी दिया तूने कि "चले जाओ यहाँ से",
फिर भी कभी कट्टी (रंजिश) न करूँगा इस जहाँ से।
इन तन्हा हाथों से ही मैं संवार दूँगा,
तेरा आशियाना, तेरी हर इक गली।
सजा दूँगा तेरी महफ़िल को कुछ इस तरह,
कि खिल उठेगी तेरे आँगन की हर इक कली।