हाइकु- ५-७-५
1
क्षण-भंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |
2
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |
3
कलयुग से
रोग ग्रस्त मस्तिष्क
रचेंगी युद्ध |
4
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
तीव्र विनाश |
5
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6
कहा पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |
7
शांत उपदेश
सूने उंगली माल
न क्रोधी व्यक्ति |
8
निर्दय भाव
करे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?
9
दौड़े मनुष्य
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |
10
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |
-© शेखर खराड़ी
तिथि-१४/७/२०२६