वीर पुत्र अभिमन्यु
धरती का वह वीर पुत्र था, रण का एक उजास था,
अर्जुन का वह नन्हा सुपुत्र, पर साहस अतुल कपास था।
नहीं डरा वह कभी काल से, न युद्ध की ललकारों से,
अनजान था वह उस साजिश से, कपट भरे वादों से।
छल का था ताना-बाना, साजिशों की बंदिशें जहाँ,
पर डरा नहीं वह बाल-वीर, गूँजी उसकी हुंकार वहाँ।
व्यूह चक्र का भेद दिया, जब बोला तीसरा पहर,
बढ़ता गया वह निडर-अचल, बन शत्रुओं के सिर पर कहर।
पीछे मुड़कर देखा उसने, कोई न दिखा अपना सज्जन,
था अकेला वह निर्भय बालक, फिर भी अडिग रहा मन।
रथ वालों को, घोड़े वालों को, एक-एक कर धूल चटाई,
साहस के उस महा-समर में, शत्रुओं को हार दिखाई।
देख पराक्रम उस बालक का, दुर्योधन तब घबराया,
कपटी मन में अधर्म जगा, सातों महारथियों को बुलवाया।
"लड़ो एक संग सारे मिलकर, मत छोड़ो इस पांडव को आज,
प्रण लिया है मैंने रण में, इसका वध करना अनिवार्य आज!"
गूँज उठी जब छल की बातें, सातों ने एक संग वार किया,
अस्त्र-शस्त्र सब काट दिए, बालक पर न कोई दया किया।
पर कहाँ हार मानने वाला था, वह वीर-श्रेष्ठ अभिमन्यु महान,
जब टूटी ढाल और छूटे अस्त्र, तब जागा रण का नया मान।
उखाड़ लिया रथ का ही पहिया, हवा में दिया घुमाए,
सातों महारथी थर-थर काँपे, जब पहिया उसने तान उठाए।
पर पीछे से कपट-वार कर, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताया,
छल से गिराया उस बालक को, पर वह बालक नहीं घबराया।
अंतिम साँस, अंतिम कतरे तक, वह रणभूमि में डटा रहा,
कौरव दल के हर अभिमानी का, झूठा मस्तक कटा रहा।
कहना जाकर मेरे पिता से, उनका पुत्र बलवान था,
लड़ा आपके मान की खातिर, जब तक प्राण में प्राण था!