“ख़त”
मैंने एक ख़त लिखा था ।
न जाने कितनी रातों की स्याही से।
कितनी दफ़ा लिखा।
कितनी दफ़ा फाड़ा।
फिर वही दर्द नए काग़ज़ पर उतार दिया।
हर सुबह
डाकिए के क़दमों में
अपनी धड़कन रख देती थी।
हर शाम
खाली हथेलियाँ
आँखों से सवाल करतीं।
मैंने सोचा…
शायद अल्फ़ाज़ कम पड़ गए।
शायद मेरी मोहब्बत उसकी ज़बान तक पहुँची ही नहीं।
या शायद…
ख़ता मेरी ही रही होगी।
फिर मौसम बदले।
बादल आए। बरसे।
बिजलियाँ कड़कीं।
उस रोज़ लगा,
रब भी मेरी ख़ामोशी पढ़कर मुस्कुरा दिया।
महीनों बाद…
एक सुबह
दरवाज़े पर एक ख़त पड़ा था।
हाथ काँप रहे थे।
दिल जवाब से पहले ही हज़ार दफ़ा धड़क चुका था।
मैंने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला।
उसमें बस इतना लिखा था
“मोहब्बत थी…
मगर निभा न सका।
मुझे माफ़ कर देना।”
बस इतना।
और अजीब बात है…
इतने छोटे-से जवाब ने
मेरी पूरी उम्र चुप करा दी।
उस दिन भी बादल बरसे थे।
बिजलियाँ कड़की थीं।
मगर इस बार आसमान मुझ पर नहीं हँसा।
वो भी मेरे साथ रोया था।
उसने मेरे टूटे टुकड़ों को समेटा।
मेरे आँसुओं को बारिश में छिपा दिया।
और पहली बार समझ आया
कुछ लोग दवा बनकर नहीं आते।
वो ज़ख़्म बनकर आते हैं,
ताकि एक दिन रब ख़ुद मरहम बनकर उतर सके।
आज भी वो ख़त मेरे पास रखा है।
अब पढ़ती नहीं…
बस छू लेती हूँ।
क्योंकि कुछ काग़ज़
मोहब्बत की निशानी नहीं होते।
वो इस बात की गवाही होते हैं
कि हमने किसी को
अपने हिस्से से ज़्यादा चाहा था।
प्राची गुर्जर …..