आत्मप्रकाश महाकाव्य
सर्ग प्रथम : मंगलाचरण एवं सृष्टि का उद्गम
लेखक – संदीप बिन्द
॥ मंगलाचरण ॥
नमन करूँ उस सत्य प्रभु को, जिसका न आदि न अंत।
जिसकी इच्छा से प्रकट हुआ, यह असीम ब्रह्म अनंत॥
जो कण-कण में स्वयं विराजे, फिर भी सबसे दूर।
जिसके सम्मुख सूर्य-चंद्र भी, लगते क्षीण और नूर॥
वाणी जिसकी सीमा न पाए, वेद करें गुणगान।
ऋषि-मुनि जिसका ध्यान लगाएँ, वही परम भगवान॥
अंधकार जब व्याप्त जगत में, न नभ था, न धरती।
न काल, न गति, न शब्द कहीं, केवल उसकी सत्ता थी॥
न दिन था, न ही रात्रि कोई, न जल, न पवन, न आग।
शून्य नहीं, वह पूर्ण चेतना, वही सृष्टि का भाग॥
उसने सोचा—"हो प्रकाश अब", और ज्योति प्रकट हो आई।
तम के गहरे मौन हृदय में, जीवन की लहर समाई॥
जन्म लिया तब काल महान ने, चल पड़ा सृष्टि का चक्र।
क्षण-क्षण में इतिहास रचा, खुला सृजन का यज्ञ॥
आकाश प्रथम विस्तृत होकर, बाँहें अपनी फैलाए।
उसकी गोदी में असंख्य लोक, तारक दीप जलाए॥
वायु चली जीवन का संदेशा लेकर हर दिशा।
जल ने धोया जग का चेहरा, बनी करुणा की भाषा॥
अग्नि बनी ऊर्जा का स्रोत, तेजस्वी उसका रूप।
पृथ्वी ने सबको आश्रय देकर, धारण किया स्वरूप॥
पंचमहाभूतों से मिलकर, बना यह अद्भुत संसार।
हर कण में ईश्वर मुस्काता, हर श्वास में विस्तार॥
वन, उपवन, पर्वत, नदियाँ, सागर का गंभीर गान।
सबमें गूँज रहा था केवल, ईश्वर का पावन नाम॥
पक्षी गाते मधुर प्रभाती, पवन सुनाए तान।
प्रकृति स्वयं आरती उतारे, जग के पालनहार॥
तब प्रभु ने अपने अंशों से, मानव तन का सृजन किया।
मिट्टी में चेतन दीप जलाकर, जीवन का वरण किया॥
कहा—"मनुष्य! तुझमें मेरी दिव्य ज्योति निवास करेगी।
तेरे कर्मों से ही तेरी, जीवन-गाथा लिखी जाएगी॥
सत्य रहेगा तेरा आभूषण, करुणा होगा मान।
धर्म-पथ पर जो चलता जाएगा, वही बनेगा महान॥
पर यदि लोभ और क्रोध घिरेंगे, भूल जाएगा ज्ञान।
तब जन्मों का चक्र चलेगा, जब तक न हो पहचान॥
याद रखो—तुम देह नहीं हो, अमर आत्मा हो तुम।
मैं ही तुममें, तुम ही मुझमें, यही सनातन क्रम॥
जब मन निर्मल, कर्म पवित्र, और हृदय हो निष्काम।
तब हर प्राणी में दिखता है, केवल मेरा धाम॥
हे मानव! जग क्षणभंगुर है, मत करना अभिमान।
साथ न जाएगा धन-दौलत, साथ चलेगा ज्ञान॥
प्रेम बाँटो, सेवा कर लो, यही अमर उपहार।
इसी पथ पर चलकर होगा, जीवन का उद्धार॥
जब-जब धर्म डगमगाएगा, मैं धरती पर आऊँगा।
राम बनूँगा, कृष्ण बनूँगा, शिव-तत्त्व जगाऊँगा॥
भक्ति बनेगी जीवन-धारा, कर्म बनेगा सेतु।
ज्ञान बनेगा सूर्य दिवाकर, मिट जाएगा हेतु॥
इस प्रकार सृष्टि का आरंभ हुआ, गूँजा ॐ का गान।
हर कण बोला एक स्वर में—
"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"
॥ इति सर्गः प्रथमः ॥