मेरे अपनों की भीड़ में,
सब कह देते हैं अपने मन की बात।
मैं उनके बीच होकर भी,
खाली कमरे जैसी
ख़ामोश रह जाती हूँ।
भीतर उठते शोर के साथ
देर रात करवटे बदलती हूँ।
कहती नहीं हूँ किसी से,
पर...
मैं अपने बुने ख़यालों से
आजाद होना चाहती हूँ,
सबकी तरह
हर रात नींद को गले लगान चाहती हूँ।