दोहा
शुभकर्मों से आपके, महक बहे हर ओर।
एक नाम की जगत में, चहुँदिश चर्चा शोर।।
तन-मन गीला हो गया, रोई आँखें आज।
समझ नहीं है आ रहा, उसके मन का राज।।
नट-बोल्ट ढीला हुआ, फीकी है मुस्कान।
बाजी उल्टी पड़ गई, फिर झूठा अभिमान।।
जीवन भी इक जंग है, भूल रहे क्यों आप।
लग जाएगा क्या भला, मुफ्त आप को पाप।।
दो मित्रों के बीच में, छिड़ी है कैसी जंग।
मुश्किल क्या अब समझना, दिखा स्वार्थी रंग।।
रिश्तों में अब जंग का, आया कैसा दौर।
यही देखना था बचा, नहीं शेष कुछ और।।
हर दिन नव उत्साह हो, संग प्यार का रंग।
बिना लड़े ही जीत लें, आने वाली जंग।।
क्यों इतना विष पी लिया, और हुए निर्द्वंद्व।
फिर क्यों इतना कर रहे, नाहक में छलछंद।।
मीठी वाणी मुख रखें, हृदय गरल का कुंभ।
इनसे तो अच्छे लगें, राक्षस शुंभ-निशुंभ।।
संत वचन है शहद सा, कुटिल वचन जस गरल।
संगति कीजै सोच कर, जीवन आप सफल।।
जगत भाव कल्याण के, किया हलाहल पान।
तब शिव शंकर को मिला, नीलकंठ का नाम।।
कालकूट भीतर भरा, वाणी शहद मिठास।
सावधान रहना सभी, भूल भाल सब आस।।
लोभ मोह को मानिए, बिल्कुल जहर समान।
खोले रखना मित्रवर, अपने आँख व कान।।
मित्र वही है आपका, करे नहीं जो भेद।
बीच भँवर जब नाव हो, नहीं करे वो छेद।।
अगर किया है मित्रता, तो फिर रखिए मान।
ऐसा कुछ मत कीजिए, कल को हो अपमान।।
जो भी मन का मीत है, सब कुछ लेता जान।
मित्र राह किस जा रहा, रखता है संज्ञान।।
कभी मित्र के साथ में, करना मत मनभेद।
गलती उसकी हो भले, आप जताओ खेद।।
तर्क और सिद्धांत का, है विशाल महत्व।
जैसे धरती आकाश का, समझो आप घनत्व।।
नेताओं के तर्क का, होता है उपहास।
होता उनका सामने, अपना दल ही खास।।
सत्य-झूठ कुछ भी नहीं, केवल मेरा तर्क।
नहीं मानते हो अगर, पियो विषैला अर्क।।
काम नहीं आती दवा, जब तक दिल में दर्द।
मिलता हमें सुकून तब, हृदय हमारा सर्द।।
दर्द पुराना है बहुत, दवा न आए काम।
बोध नहीं सुकून का, रहे दूर आराम।।
बच्चे नहीं चला रहे, अब कागज की नाव।
क्योंकि अब मिलता कहाँ, पहले वाला गाँव।।
अपने भारत देश का, है विचित्र ही रंग।
राजनीति की देखकर, होते रहिए दंग।।
बिन चिंतन के जो करे, अपने सारे काम।
होना पड़ता है उसे, एक रोज बदनाम।।
झटके पर झटका मिले, फिर भी रहा न चेत।
इसीलिए तो बिक गया, तेरा सारा खेत।।
सभी तरक्की चाहते, बिना किए कुछ काम।
और संग में भावना, ऊँचा हो मम नाम।।
पहले खुद का कीजिए, अपना आज सुधार।
फिर दूजा को बाँटिए, ज्ञान बात व्यवहार।।
दुनिया का जो आचरण, लगता हैं क्यों भार।
पहले थोड़ा तो करो, अपना आज सुधार।।
अपना आज सुधारिए, फिर बनना तुम संत।
अभी आपका दिख रहा, अंदर बाहर दंत।।
पहले जीना सीख लो, वर्तमान में मित्र।
अपना आज सुधारकर, दूजा देखो चित्र।।
अपना आज सुधारते, वही सफल हैं लोग।
कल आता है कब भला, पड़े भोगना भोग।।
अपना आज सुधार लो, तुम अपना सुर-ताल।
अच्छा होता है नहीं, व्यर्थ बजाना गाल।।
चिढ़ा रहा वार्धक्य है, पर मन अभी जवान।
अनुभव का दीपक जले, है दूरस्थ पयान।।
मन भावन सावन लगे, रिमझिम पड़े फुहार।
शिव-शंकर को पूजता, है सारा संसार।।
काँवड़िए जल भर चले, भोले के दरबार।
मनभावन सावन कहे, कर लो जय जयकार।।
मन के मधुरिम राग से, गूंजित हो झंकार।
ईश कृपा इतनी रहे, हो नूतन विस्तार।।
वाणी तो तलवार से, करती दो-दो हाथ।
इनका आपस में कभी, काश नहीं हो साथ।।
बोली की गोली सदा, देती गहरा घाव।
सोच समझ कर बोलना, देता मित्र सुझाव।।
गोली से डरते नहीं, अपने वीर जवान।
हर दुश्मन के सामने, जाते सीना तान।।
जीवन के आधार का, सदा करो सम्मान।
नाहक ही बनिए नहीं, आप सभी नादान।।
मातु-पिता के साथ ही, गुरुवर का स्थान।
जीवन के आधार में, इनका मिश्रित ज्ञान।।
जीवन के आधार को, भूल रहे हैं लोग।
जिसके प्रतिफल में मिले, रोग शोक दुख भोग।।
सबके अपने कर्म का, दिख जाता है सार।
चल जाता जग को पता, जीवन का आधार।।
करना है यदि याचना, तो प्रभु सबसे श्रेष्ठ।
उसके आगे कौन है, जिसको मानें ज्येष्ठ।।
करो नहीं अब याचना, बनो नहीं लाचार।
बाँध कफन आगे बढ़ो, और करो प्रतिकार।।
याचक की अब याचना, तोड़ रही दम रोज।
आखिर अब कैसे करें, नई राह की खोज।।
आज याचना रंग भी, बदल रहा है खोल।
धमकी देकर प्रार्थना, अरु जहरीले बोल।।
काम आप ऐसा करो, फैले मन उल्लास।
और नहीं दूजा करे, कैसे भी परिहास।।
मन से सभी निकालिए, जितना भरा विषाद।
प्रेम भाव निस्वार्थ हो, जस श्रीराम निषाद।।
ग़म खाता जो मगन हो, वो है ईश समान।
ऐसे जन से लीजिए, जीवन का गुरु ज्ञान।।
पीता है जो जहर भी, लगा ईश को भोग।
मृत्यु भागती दूर है, बिना किसी संयोग।।
ईश्वर ने चाहा नहीं, पूरी हुई न चाह।
फिर भी मन मेरे भरा, अटल अमिट उत्साह।।
पूरी हुई न चाह तो, रो मत मेरे यार।
कोशिश करते ही रहो, किए बिना तकरार।।
मन से रखना दूर है, पूरी हुई न चाह।
उम्मीदें मत छोड़ना, ईश्वर देगा राह।।
छोड़ निराशा तुम बढ़ो, सदा सत्य की राह।
भले नहीं पूरी हुई, जिंदा रखना चाह।।
पूरी हुई न चाह का, व्यर्थ छेड़ तू राग।
हार मान मत बैठना, कल सोना अब जाग।।
गुरुवर अब सुन लीजिए, मेरी करुण पुकार।
या फिर हमको दीजिए, आप हमें दुत्कार।।
आज कौन सुनता भला, निर्बल करुण पुकार।
चाहे जितना रात-दिन, भले करें चीत्कार।।
शब्द करुण संवेदना, हमें कराता बोध।
ऐसा कुछ इसमें नहीं, जो करते सब शोध।।
सभी आज बीमार हैं, क्या कोई संयोग।
या फिर कोई कर रहा, नाहक नया प्रयोग।।
तरस रहे दीदार को, जिनकी खातिर लोग।
जो करते निज समय का, अर्थ लाभ उपयोग।।
सहज भाव रहिए सदा, बिना किसी संताप।
सबके हित की कामना, सुखदा माला जाप।।
हर प्राणी यदि हो सरल, जगत बने खुशहाल।
आपस में होवै नहीं, नाहक व्यर्थ बवाल।।
रखता अपने आप को, जो भी सदा सुबोध।
उसके जीवन में नहीं, आता है अवरोध।।
जो भी बोले आजकल, साफ और स्पष्ट।
उसे उठाना ही पड़े, कदम-कदम पर कष्ट।।
प्रांजल दिवस विशेष है, रखिए इसका ध्यान।
जीवन साथी का करो, सदा आप सम्मान।।
नहीं छोड़िए हौसला, हर मुश्किल आसान।
मगर आप करना नहीं, इक पल भी अभिमान।।
चाहे जैसा घोंसला, अपना लगता खास।
टूटा-फूटा हो मगर, करता नहीं उदास।।
शिव शंकर को पूजिए, रख मन में विश्वास।
औघड़दानी नाथ हैं, पूरी करेंगे आस।।
देवाधिदेव महादेव जी, कालों के हैं काल।
भक्तों पर करते कृपा, पापी होत निढाल।।
गंगा जी हैं बह रहीं, उलझ जटा शिव शीश।
नीलकंठ मदमस्त हैं, बने हुए अवनीश।।
किसकी होती जीत है, किसकी होती हार।
करना कौन विचार है, बिना समझ के सार।।
हार जीत के चक्र में, उलझ रहे क्यों लोग।
ईश्वर की होती कृपा, बने सुखद संयोग।।
चुना आपने स्वयं ही, तब कैसी तकरार।
नाहक ही हो पूछते, कैसी है सरकार।।
सोचो समझो आप ही, कैसी हो सरकार।
जनता हित के साथ ही, करें राष्ट्र से प्यार।।
हम सबको है सोचना, कैसी हो सरकार।
सोचे बस जो देश की, नहीं सिर्फ परिवार।।
वोट डालते समय क्या, सोचा था इक बार।
फिर रोना क्यों रो रहे, कैसी हो सरकार।।
अपने हित को देखकर, सबकी बिछे बिसात।
नीति नियम सिद्धांत को, छोड़ करें सब घात।।
कावड यात्रा में दिखे, छाया भगवा रंग।
भक्ति भावना है प्रवल, भोले बाबा संग।।
शिव मंदिर में भीड़ का, दिखता है उत्साह।
कावड़ यात्री कर रहे, सुविधा खूब सराह।।
श्रद्धा अरु विश्वास का, बहती दिखे बयार।
कावंड़ियों को देखकर, समझ रहा था सार।।
सुबह-साँझ की साधना, कर देती मन धीर।
जीवन पथ होता सुगम, मिटती प्राणी पीर।।
सूरज होता अस्त जब, नित्य साँझ के साथ।
कल के नूतन आस का, पकड़ाता है हाथ।।
प्रेम जगत का सार है, जान रहे हैं लोग।
फिर क्यों इसकी आड़ में, फैलाते हैं रोग।।
जन-मन के कल्याण का, प्रेम जगत का सार।
श्रद्धा करुणा विश्वास, सर्वश्रेष्ठ आधार।।
हर प्राणी को चाहिए, करें नहीं अभिमान।
प्रेम जगत का सार है, ज्ञानी देते ज्ञान।।
सतपथ पर चलिए मगर, इतना रखिए ध्यान।
विष हिस्से में आपके, मुफ्त लीजिए ज्ञान।।
चाहे जितना कीजिए, अमृत पान ही रोज।
धर्म कर्म के मार्ग तू, सबसे पहले खोज।।
कुदरत के संकेत का, करो नहीं उपहास।
वरना होगे मित्र कल, निश्चित आप उदास।।
कुदरत का संकेत है, रहिए आप सतर्क।
जल्दी ही आ जाएगा, आँख सामने फर्क।।
धरती के भगवान को, कुदरत का संकेत।
आने वाला समय है, जाना तुमको खेत।।
कुदरत के संकेत का, हमें समझना सार।
सबसे उत्तम आज का, यही श्रेष्ठ आधार।।
आजादी के गीत हम, गाते खूब हैं आज।
नहीं और कुछ रह गया, करें इसी पर नाज।।
आजादी के गीत को, देश रखेगा याद।
ऐसा होता ही रहे, बिना किसी उन्माद।।
करते उनको याद हम, बलिदानी जो वीर।
भारत माँ की गोद में, मौन हुए रणधीर।।
करिए उनको याद सब, दिये देश को मान।
आजादी के रंग से, रचा भारती गान।।
करते उनको याद जब, भीग रहे हैं नैन।
दे आजादी जो गये, भूले कब दिन रैन।।
श्रद्धा के दो पुष्प से, करिए उनको याद।
आज हमें दिखते नहीं, आजादी के बाद।।
करते उनको याद तो, क्या करते अहसान।
जो भी ऐसा कर रहे, वे करते अभिमान।।
अब प्रतीत होने लगा, वो रचता षड्यंत्र।
अपने पद की आड़ में, करता है कुछ तंत्र।।
उसको कहाँ प्रतीत हो, करता कैसी भूल।
पद प्रतिष्ठा मान सब, मिला रहा है धूल।।
जैसा उसका नाम है, वैसे करता काम।
बदनामी से चाहता, ऊँचा हो मम नाम।।
ग़म खाता जो आज है, सब कहते बेवकूफ।
कहाँ किसी को है पता, ईश्वर में मशरूफ।।
पीता है जो नित्य ही, उसके तर्क विचित्र।
कहता यही तो आज, सबसे प्यारा मित्र।।
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भूली बिसरी बात
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भूली बिसरी बात भी, मन को देती चैन।
आती है जब याद तो, भीगें प्राणी नैन।।
नाहक करते याद क्यों,भूली बिसरी बात।
पहुँचाते जब आपको, आए दिन आघात।।
भूली बिसरी बात का, अपना अलग महत्व।
नहीं समझ सकते सभी, इसमें है जो तत्व।।
भूली बिसरी बात पर, होना नहीं अधीर।
जीवन के हर दौर में, बन रहिए रणधीर।।
भूली बिसरी बात से, रह सकते हो दूर।
खुद पर अंकुश आपको, नहीं बनो मजबूर।।
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राखी
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राखी बंधन प्रेम का, भ्रात-बहन का मान।
पावन ये रिश्ता बड़ा, कहता जगत महान॥
राखी धागा संग में, बरसे प्यार दुलार।
भाई रक्षा वचन दे, समझाए अधिकार॥
रिमझिम बारिश बीच में, आया राखी पर्व।
कच्चे धागों में बँधा, भाई-बहना गर्व॥
राखी धागे में बँधा, रिश्ता बड़ा अटूट।
चाहे जितनी दूरियाँ, बंधन कभी न छूट॥
राखी बाँधे हाथ में, भर आँखों नूर।
देती ढेरों वो दुआ, हर बाधा हो दूर।।
राखी धागों में बँधा, भाई-बहन का प्यार।
बिन भाई या बिन बहन, सून लगे संसार।।
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सैनिक
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सीमा पर सैनिक खड़ा, अरि को दे ललकार।
दुश्मन से प्रतिशोध का, उत्तर दे खूँखार॥
अरि की गोली से गिरा, अपना सैनिक वीर।
साथीगण प्रतिशोध में, होते सदा अधीर॥
देकर अपने प्राण भी, सैनिक रखते मान।
अरि का काटे शीश वो, ले प्रतिशोध सुजान॥
अरि आँखों में झाँककर, सैनिक करता वार।
पूरा कर प्रतिशोध वो, करता जय-जयकार।।
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बहन
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बड़ी बहन है मातु सम, अनुजा सुता समान।
भ्राताओं की जान हैं, रखती बहुधा ध्यान।।
बहन बड़ी बरगद सदृश, देती शीतल छाँव।
भाई का दुख ओढ़ ले, देती संबल ठाँव।।
झगड़े रुठे प्यार दे, करे शिकायत खूब।
बहन बिना आँगन गया, सूनेपन में डूब।।
बहन हमारी लाड़ली, वो है मेरी जान।
जिस पर करता मैं सदा, गर्व भरा अभिमान।।
माँ सी ममता दे सदा, बेटा सम करती प्यार।
करें शरारत हम कभी, देती भूत उतार।।
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सावन
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सावन में अभिषेक का, अपना बड़ा महत्व।
इसके पीछे शिव छिपा, स्वयं गूढ़तम तत्व।।
अज्ञानी हम सब बड़े, भले न समझें सार।
शिव जी के अभिषेक से, मिले जगत उपहार।।
रिमझिम बारिश बीच में, शिव पूजन की भीड़।
हर जन-मन है चाहता, मिट जाए हर पीड़।।
शिव मंदिर में भीड़ है, आया सावन मास।
भक्तों में उत्साह का, दृश्य बहुत है खास।।
सावन में शिव पूजना, सबका नहीं नसीब।
जिन पर भोले की कृपा, रहता कहाँ गरीब।।
सावन की बरसात है, खेतों को वरदान।
कृषकों की उम्मीद को, ईश्वर का अवदान॥
बहनों में उत्साह है, आया सावन मास।
राखी का त्योहार भी, इसे बनाए खास॥
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जिसकी जैसी सोच है
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जिसकी जैसी सोच है, वैसे उसके काम।
कुछ को चिंता काम की, कुछ होना बदनाम।।
जिसकी जैसी सोच है, वैसा दिखे चरित्र।
इसीलिए यमराज क्या, मेरे अच्छे मित्र।।
कहते हैं यमराज जी, जिसकी जैसी सोच।
पर मुश्किल है जानना, किसमें कितना लोच।।
जिसकी जैसी सोच है, वैसे उसका कर्म।
मजबूरी में ही सही, भूल रहे निज धर्म।।
जिसकी जैसी सोच है, वैसा लिखे कवित्त।
कुछ का बढ़ता भाव है, कुछ हो जाते चित्त।।
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तुमसे बढ़कर कौन
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तुमसे बढ़कर कौन है, क्या बतलाऊँ यार।
करना मुझको है नहीं, नाहक ही तकरार।।
नाहक ही हो पूछते, तुमसे बढ़कर कौन।
मानो प्यारे बात तुम, हो जाओ बस मौन।।
तुमसे बढ़कर कौन है, करिए आप विचार।
पर पहले यह जान लो, छोटा है संसार।।
सच सुनना हो चाहते, तुमसे बढ़कर कौन।
अच्छा लगना है नहीं, इसीलिए तो मौन।।
तुमसे बढ़कर कौन है, इसमें कैसा रार।
मम गुरुवर सबसे बड़े, करते हमसे प्यार।।
अगर चाह लें हम सभी, उन्नति करे समाज।
तब ही सबके शीश, सुख-सुविधा का ताज।।
समझ रहे हैं हम सभी, कैसा हुआ समाज।
सभी चाहते आज हैं, निज स्वारथ का राज।।
कभी-कभी प्यादे बड़े, कर देते हैं काम।
जिससे मिल जाता हमें, नाहक ही सम्मान।।
वादा करना बाद में, पहले करो विचार।
पूरा करना आपका, भला कहाँ संस्कार।।
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भेदभाव से दूर
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कितना हम सब हो गए, भेदभाव से दूर।
जान रहे हैं ये सभी, करो नहीं मजबूर।।
भेदभाव से हम भला, रह सकते क्या दूर।
राजनीति के खेल का, यही चमकता नूर।।
भेदभाव से दूरियाँ, रखने का क्या काम।
वैसे भी क्या लाभ हैं, सिर्फ हुए बदनाम।।
भेदभाव से दूर का, मंत्र पढ़ें जो लोग।
सबसे ज्यादा हैं वही, फैलाते जो रोग।।
कोशिश तो होती रही, भेदभाव हो दूर।
पर वोटों की आड़ में, कुर्सी रहती घूर।।
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उलझन सबकी एक है
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उलझन सबकी एक है, जिम्मेदारी का भार।
नहीं आय के स्रोत बिन, फँसी नाव मझधार।।
हम सबको ही है पता, उलझन सबकी एक।
अलग बात यह और है, तर्क वितर्क अनेक।।
उलझन सबकी एक है, मरते नित आधार।
स्वार्थ लोभ के फेर में, भूल रहे संस्कार।।
उलझन किसको आज है, रिश्ते खोते धार।
कितने विचलित हो रहे, खोकर प्यार दुलार।।
उलझन सबकी एक है, कहने को तो आज।
पर हर कोई चाहता, बने हमारा काज।।
लंबी इतना क्यों भला, अगर आप आजाद।
इसका मतलब यह नहीं, करो देश बरबाद।।
केवल इतना कह रहा, मानो मेरी बात।
माना तुम आजाद हो, फिर क्यों करते घात।।
सुधीर श्रीवास्तव