तलाश
यूं ही अनमनी सी, मन की गहराइयों में मैं,
कुछ खोज रही थ,ी जिसे ढूंढ न पाई मैं |
कुछ कचोटता था, जो मुझमें नदारद था ,
दिल में दबा था, जबा पर अभी तक अलुप्त था,
तलाश रही थी वो बीते सपने सुनहरे,
कुछ कामना कुछ अभिलाष के टूटे कतरे,
जग ने दिए थे सीख के नाम पर, घाव जो गहरे,
सहलाकर, सुषुप्त भाव पलकों पर वो जो आ ठहरे,
ढूंढती रही जहाँ में वो सतरंगी नजारे,
बैरंग बचे थे मेरी आँखों में, आज वो सारे,
जीने की आस, ऊर्जा, वो उम्मीदें ,
भुलाए भूलती नहीं ,कटुता भरी यादें ,
स्मरण है, मुझे और रहेगा धोखा, छलावा,
अपनेपन की बातों से, वो गर्ज, वो दिखावा ,
झंझावात भरी वो जिम्मेदारियां सारी,
जिनको निभाने में आयु गुजरी हमारी ,
याद करती हूँ जब वह बचपन के किस्से ,
मुझे याद रह गए बस, इस घर के रिश्ते,
वो मन की उलझनें वो तनाव भरी रातें ,
वो स्वाभिमान से जीने की खोखली बातें ,
निकल ही तो गई उम्र मेरी सारी ,
कभी ,कहीं भी न बनी मैं बेचारी,
पाया वो अनंत जो मेरे भाग्य बदा था ,
अंतर व्यथा अनकहि गहरे दह दबा था,
वो आत्म मंथन वो संस्कार की बातें,
वो सीख सलाह वो भली-बुरी, सौगातें ,
इन्हीं शब्दों ने हरदम मुझको छला है,
किसी को सीख, तो किसी को धन मिला है,
अब तक की बीत गई, आगे भी जाएगी बीत,
बस अब न निभा पाऊँगी, मैं दुनिया की यह रीत,
तलाश रही थी जो मुझमे वो मुझे कहीं न मिला ,
क्योंकि मेरा जीवन सदा जग अनुरूप ही ढला |
प्रभा पारीक