शुक्र करो
शुक्र करो, कुछ नहीं मिला,
ये ग़म की बात नहीं,
शायद ख़ुदा ने
तुम्हारी चाहत नहीं,
तुम्हारी ज़िंदगी देखी है कहीं।
जिसे चाहा, वो नहीं मिला,
तो इसे हार मत कहना,
कभी-कभी छूट जाना भी
बच जाना होता है।
हड़बड़ी में ट्रेन छूट जाए,
तो स्टेशन पर बैठकर रो मत देना,
कौन जाने उसी इंतज़ार में
कोई अनजान रास्ता
तुम्हें तुम्हारी मंज़िल दे दे।
हर देर सज़ा नहीं होती,
हर बिछड़ना ग़म नहीं होता,
कुछ चीज़ें इसलिए छूटती हैं
क्योंकि उनके बाद
कुछ बेहतर होना होता है।
बस इतना याद रखना…
जो तुम्हारे लिए था,
वो तुम्हें ढूँढ़ लेगा।
और जो नहीं मिला,
शुक्र करो।
शायद ख़ुदा
तुम्हें उससे भी बेहतर
देना चाहता था।
प्राची गुर्जर….