हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अप्सराएं स्वर्ग लोक (देवलोक) में देवराज इंद्र की सभा का हिस्सा थीं और उनका मुख्य कार्य अपने नृत्य, संगीत व सौंदर्य से देवताओं को प्रसन्न रखना और उनका मनोरंजन करना था । गंधर्वों के संगीत और अप्सराओं के नृत्य को स्वर्ग की शान और सुंदरता का प्रतीक माना जाता था। वे स्वर्ग के वातावरण को दिव्य और आनंदमय बनाए रखती थी।
देवराज इंद्र का सिंहासन हमेशा खतरे में रहता था। जब भी कोई ऋषि-मुनि या असुर धरती पर कठोर तपस्या करते थे, तो इंद्र को डर रहता था कि वे कहीं उनकी शक्ति या स्वर्ग का आधिपत्य न छीन लें। देवताओं के आदेश पर अप्सराएं अपनी मोहक सुंदरता और नृत्य-संगीत के माध्यम से महान तपस्वियों और ऋषियों का ध्यान भटकाने (तपस्या भंग करने) के लिए भेजी जाती थीं। मेनका द्वारा विश्वामित्र की तपस्या भंग करना इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है। पुराणों के अनुसार, अप्सराओं की उत्पत्ति जल या सौंदर्य के सार से हुई थी। उनका कार्य केवल विलासिता नहीं, बल्कि देवताओं के कार्यों में सहायता करना और देवलोक की राजनीतिक व ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखना था।