भाग 12
विवेक ने गुफा के भीतर कदम रखा, टॉर्च की रोशनी में वह आगे बढ़ा। अंदर आते ही, हवा और भी ठंडी और नम हो गई थी, जैसे किसी पुरानी कब्र में साँस ले रहा हो। हर तरफ से टपकते पानी की आवाज़ गूँज रही थी, और हवा में सड़ी हुई गंध अब इतनी तेज़ थी कि साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था। गुफा का प्रवेश द्वार पीछे छूट गया और अंधेरा इतना घना था कि टॉर्च की रोशनी भी मुश्किल से कुछ फीट आगे तक पहुँच पा रही थी।
उसने टॉर्च को चारों ओर घुमाया। दीवारें खुरदुरी चट्टानों से बनी थीं, जिन पर हरे रंग की काई जमी हुई थी। कुछ जगहों पर, उसे प्राचीन नक्काशीदार प्रतीक दिखे, जो डॉ. मेहता ने दिखाए थे – वही जो बेसमेंट के दरवाज़े और मंदिर के खंडहरों पर थे। ये प्रतीक यहाँ भी थे, जैसे कोई पुरानी चेतावनी या किसी चीज़ को छिपाने का निशान।
जैसे-जैसे विवेक आगे बढ़ा, उसे लगा जैसे ज़मीन धीरे-धीरे ढलान पर जा रही है। उसके जूतों के नीचे छोटे-छोटे पत्थर खिसक रहे थे, और हर कदम पर उसे और भी ज़्यादा सतर्क रहना पड़ रहा था। दुष्ट शक्ति के प्रभाव से उसे अजीबोगरीब आवाज़ें सुनाई देने लगीं। कभी दूर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़, कभी पुरानी लोरी, और कभी रिया, छाया या अनुराग की डरी हुई फुसफुसाहटें। ये आवाज़ें इतनी असली लग रही थीं कि एक पल को विवेक को लगा कि वे उसके साथ ही अंदर आ गए हैं। उसे अपनी भावनाओं पर काबू रखना था। यह सब दुष्ट शक्ति का भ्रम था, उसे डराने और भटकाने की कोशिश।
अचानक, टॉर्च की रोशनी कम होने लगी, जैसे उसकी बैटरी खत्म हो रही हो। विवेक घबरा गया। उसने टॉर्च को हिलाया, उसे बार-बार चालू-बंद किया, लेकिन रोशनी लगातार फ्लिकर कर रही थी। कुछ ही पलों में, टॉर्च पूरी तरह से बुझ गई, और विवेक पूरी तरह से अंधेरे में डूब गया। गुफा के अंदर का अंधेरा ऐसा था जिसे हाथों से छुआ जा सकता था। वह इतना घना और भारी था कि उसे लगा जैसे वह किसी विशाल काली स्याही के समुद्र में डूब गया हो।
"नहीं... नहीं!" वह बुदबुदाया, उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। दुष्ट शक्ति उसे रोकना चाहती थी। वह चाहता था कि वह डर जाए और वापस लौट जाए।
उसे याद आया कि डॉ. मेहता ने कहा था कि अनुष्ठान के लिए मानसिक एकाग्रता बहुत ज़रूरी है। उसने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। उसने अनुराग के बीमार चेहरे, छाया के चिंतित हाव-भाव और रिया की डरी हुई आँखों के बारे में सोचा। उसे यह करना ही था। उसने अपनी जेब से अपना फोन निकाला, उसकी स्क्रीन की हल्की रोशनी किसी भी काम की नहीं थी, लेकिन उसने उसका फ्लैशलाइट ऑन किया। फोन की फ्लैशलाइट टॉर्च जितनी तेज़ नहीं थी, लेकिन इतनी थी कि उसे अपने ठीक सामने का रास्ता दिख सके।
वह सावधानी से आगे बढ़ता गया। रास्ता और भी संकरा होता जा रहा था, और उसे कुछ जगहों पर रेंगकर या झुककर निकलना पड़ा। दीवारों से अजीबोगरीब चिपचिपी चीज़ें लटकी हुई थीं, जिन्हें छूने पर उसे घिन महसूस हुई। उसे लगा जैसे हवा में कुछ भारी-सा मौजूद है, जो उसकी साँसों को रोक रहा है। उसे घुटन महसूस हो रही थी।
फिर, उसे दूर से पानी के टपकने की आवाज़ सुनाई दी, जो पहले से ज़्यादा तेज़ थी। यह झरना था! डॉ. मेहता ने कहा था कि नीला फूल झरने के पास ही मिलेगा। उसमें उम्मीद की एक नई किरण जगी।
वह आवाज़ की दिशा में बढ़ता गया। जैसे-जैसे वह करीब पहुँचा, पानी की आवाज़ एक छोटे से झरने के गिरने जैसी हो गई। उसने फोन की फ्लैशलाइट से रोशनी की, और देखा कि वह एक छोटे से, खुले से चेंबर में आ गया था। चेंबर की छत से पानी की पतली धाराएँ गिर रही थीं, जो नीचे एक छोटे से कुंड में जमा हो रही थीं। कुंड का पानी साफ और शांत था, और उससे एक अजीब-सी रोशनी निकल रही थी।
और हाँ, वहीं कुंड के किनारे, उन नम चट्टानों पर, एक नीला फूल खिला हुआ था।
यह कोई साधारण फूल नहीं था। यह एक छोटा, नाजुक फूल था जिसमें एक हल्की नीली चमक थी, जैसे किसी तारे की रोशनी ज़मीन पर उतर आई हो। उसकी पंखुड़ियाँ मुलायम लग रही थीं, और उससे एक अजीब-सी, लगभग स्वर्ग जैसी खुशबू आ रही थी, जो गुफा की सड़ी हुई गंध से बिल्कुल विपरीत थी। यह अपने आस-पास की हर चीज़ से अलग दिख रहा था, एक छोटे से चमकते हुए रत्न की तरह। उसे देखकर विवेक को एक पल के लिए सारी थकान और डर भूल गया।
लेकिन जैसे ही विवेक उसकी ओर बढ़ा, कुंड के पानी में हलचल हुई। पानी से एक अजीब सी आकृति ऊपर उठी, जो धुएँ जैसी थी, और उसमें से एक नीची, भयानक फुसफुसाहट सुनाई दी। यह दुष्ट शक्ति की अभिव्यक्ति थी, जो उसे नीला फूल लेने से रोकना चाहती थी। धुएँ जैसी आकृति ने अपने अदृश्य हाथ विवेक की ओर बढ़ाए, जैसे उसे पकड़ने और खींचने की कोशिश कर रही हो।
विवेक ने तुरंत डॉ. मेहता के शब्दों को याद किया: "यह इकाई आपको वहाँ जाने से रोकने की पूरी कोशिश करेगी।" उसने अपनी हिम्मत बटोरी। उसने उस अदृश्य आकृति के बावजूद आगे बढ़ना चाहा, लेकिन उसे लगा जैसे उसके पैर ज़मीन में जम गए हों। एक अदृश्य बल उसे रोके हुए था।
उसने अपने मन को शांत करने की कोशिश की। उसने याद किया कि उसे उस फूल को सीधे हाथ से नहीं छूना था। उसने तुरंत डॉ. मेहता द्वारा दिया गया चमड़े का दस्ताना निकाला और उसे पहना। फिर, उसने अपने बैग से कांच का जार निकाला।
दुष्ट शक्ति की फुसफुसाहटें और तेज़ हो गईं, जैसे वह गुस्से में हो। धुएँ वाली आकृति और करीब आ गई, अब विवेक को ठंडी, सड़ी हुई हवा का झोंका महसूस हो रहा था, जो सीधे उससे आ रहा था। उसके दिमाग में भयानक चित्र उभरने लगे – अनुराग का दम घुट रहा है, रिया चिल्ला रही है, छाया अंधेरे में खो गई है। यह सब उसे विचलित करने के लिए था।
लेकिन विवेक ने अपनी आँखों को नीले फूल पर टिकाए रखा। वह जानता था कि यही उनकी आखिरी उम्मीद है। उसने अपना हाथ बढ़ाया, दस्ताने से ढका हुआ, और बड़ी सावधानी से नीले फूल को उसकी जड़ से तोड़ा। जैसे ही उसने फूल को तोड़ा, धुएँ वाली आकृति ने एक भयानक चीख निकाली, जो पूरे गुफा में गूँज उठी, और कुंड का पानी हिंसक रूप से उफनने लगा।
विवेक ने बिना देर किए फूल को कांच के जार में रखा और ढक्कन कसकर बंद कर दिया। जैसे ही ढक्कन बंद हुआ, चीख धीमी पड़ गई और धुएँ वाली आकृति धीरे-धीरे वापस पानी में समाने लगी। दुष्ट शक्ति की पकड़ कमजोर हो गई थी, कम से कम अभी के लिए।
उसने फूल को सुरक्षित पा लिया था। अब उसे जल्द से जल्द बाहर निकलना था। लेकिन अभी भी एक बात थी जो डॉ. मेहता ने कही थी – कवच। क्या यहाँ कवच का कोई सुराग था?
उसने फोन की फ्लैशलाइट से चेंबर की दीवारों को फिर से स्कैन किया। प्रतीक अभी भी वहीं थे। लेकिन एक जगह, कुंड के ठीक ऊपर एक चट्टान पर, उसे एक और नक्काशी दिखी। यह एक जटिल प्रतीक था, जो पहले देखे गए प्रतीकों से अलग था। प्रतीक के ठीक नीचे एक छोटी सी, चिकनी जगह थी, जैसे किसी चीज़ को वहाँ रखा गया हो। वहाँ कुछ भी नहीं था, बस एक खाली जगह।
विवेक ने उस प्रतीक को अपने फोन में रिकॉर्ड किया। उसे लगा कि यह कवच से जुड़ा कोई सुराग हो सकता है, लेकिन अभी उसे समझना उसके लिए असंभव था। उसे पहले बाहर निकलना था।
उसे लगा जैसे गुफा की दीवारें हिल रही हैं, जैसे कोई उन्हें अंदर ही दफन करना चाहता हो। दुष्ट शक्ति गुस्सा थी। विवेक ने तेजी से कदम बढ़ाए और उसी रास्ते से वापस लौटने लगा, जिस रास्ते से वह आया था। उसके मन में अब सिर्फ़ एक ही लक्ष्य था – नीले फूल को सुरक्षित रूप से बाहर ले जाना और अपने दोस्तों तक पहुँचना। गुफा के अंधेरे में, वह अपनी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई जीत चुका था, लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी थी।