Pahli Mulakaat - 4 in Hindi Love Stories by Gaurav Pathak books and stories PDF | पहली मुलाकात - अध्याय 4

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पहली मुलाकात - अध्याय 4

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अध्याय 4 – मुश्किलों की दस्तक

दिन बीतते-बीतते मुकुंद कॉलेज की लय पकड़ने लगा था। सुबह की lectures, library का समय, और रात को terrace पर सपनों के बारे में सोचना उसकी आदत बन गई थी। लेकिन जीवन की राह कभी सीधी नहीं होती—और मुकुंद के सफ़र में भी एक नई कठिनाई दस्तक देने वाली थी।

एक शाम जब मुकुंद library से लौट रहा था, हॉस्टल के गेट पर चपरासी ने उसे एक चिट्ठी थमाई। यह उसके गाँव से आई थी। उसने जैसे ही लिफ़ाफ़ा खोला, उसकी आँखें भर आईं।

पिता ने लिखा था—
“बेटा, इस बार फसल बहुत खराब हुई है। बाजार में दाम भी गिर गए। घर का खर्च मुश्किल से चल रहा है। तुम्हारी फीस भरना अब और भारी होता जा रहा है। कोशिश करेंगे, पर पता नहीं कब तक।”

मुकुंद की उँगलियाँ काँप गईं। उसे ऐसा लगा जैसे ज़मीन पैरों तले से खिसक रही हो। वह जानता था कि इस कॉलेज की फीस उसके पिता की सामर्थ्य से कहीं ज्यादा है। उसने कमरे में लौटकर चुपचाप चिट्ठी को तकिए के नीचे रख दिया।


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सुदीप ने देखा कि मुकुंद असामान्य रूप से चुप है।
“क्या हुआ भाई? आज बड़े serious लग रहे हो।”

मुकुंद ने टालते हुए कहा,
“कुछ नहीं… बस थोड़ा घर याद आ रहा है।”

लेकिन भीतर ही भीतर वह जानता था कि सच कितना भारी है। वह यह बोझ अपने roommate पर नहीं डालना चाहता था।


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अगले दिन, class के दौरान मुकुंद का ध्यान बिल्कुल भटका हुआ था। प्रोफेसर सवाल पूछते रहे, लेकिन उसका मन बार-बार चिट्ठी के शब्दों पर अटकता रहा। उसने नोटबुक खोली, पर पन्ने खाली रह गए।

Lunch break में आन्या ने देखा कि मुकुंद बिल्कुल शांत है।
“सब ठीक है? तुम बहुत उदास लग रहे हो।”

मुकुंद ने हल्की मुस्कान दी,
“हाँ, बस थोड़ा थक गया हूँ।”

आन्या ने महसूस किया कि कुछ तो है, लेकिन उसने और दबाव नहीं डाला।


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शाम को हॉस्टल में एक और परेशानी खड़ी हो गई। Room 705 के सामने वाले कमरे के कुछ लड़के जोर-जोर से गाने बजा रहे थे और मज़ाक कर रहे थे। जब मुकुंद ने उनसे धीरे से आवाज़ कम करने को कहा—ताकि वह पढ़ सके—तो उनमें से एक लड़के ने ताना मार दिया,
“ओहो, गाँव का पंडित आया है पढ़ाई करने! अरे भाई, ये hostel है, library नहीं।”

बाकी लड़के हँस पड़े। मुकुंद ने कुछ नहीं कहा, बस अपने कमरे में लौट आया। लेकिन उसका मन अंदर से टूटने लगा। उसे लगा जैसे हर मोर्चे पर वह अकेला पड़ रहा है—घर की जिम्मेदारियाँ अलग, और यहाँ का माहौल अलग।

सुदीप ने यह सब सुना। उसने उन लड़कों से सीधे जाकर कहा,
“देखो, मजाक करना ठीक है, लेकिन respect भी ज़रूरी है। मुकुंद मेरा roommate है, और अगर उसे पढ़ना है तो पढ़ेगा। कोई दिक़्क़त है तो मुझसे बात करो।”

यह सुनकर लड़के चुप हो गए। मुकुंद के दिल में सुदीप के लिए सम्मान और बढ़ गया। उसने महसूस किया कि हर मुश्किल में कोई न कोई सहारा ज़रूर मिल जाता है।


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रात को मुकुंद terrace पर बैठा आसमान की ओर देख रहा था। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें दृढ़ता भी थी। उसने खुद से कहा—
“पैसे की तंगी है, लोग हँसते हैं, हालात कठिन हैं… लेकिन मैं हार नहीं मानूँगा। माँ-बाबा ने जो सपने मेरे लिए देखे हैं, उन्हें पूरा करना ही मेरी पूजा है।”

उसी समय उसके पास आन्या आ गई। शायद वह उसे ढूँढते हुए आई थी।
“मुकुंद, अगर कभी बात करना चाहो… मैं हूँ।”

मुकुंद ने उसकी आँखों में देखा और पहली बार मन हल्का किया। उसने धीरे-धीरे अपने घर की स्थिति, पिता की मेहनत और फीस की चिंता उसे बता दी। आन्या चुपचाप सुनती रही। उसके चेहरे पर न sympathy थी, न pity—बस एक सच्चा साथ।
“तुम अकेले नहीं हो। अगर मेहनत करोगे, तो रास्ते खुद बनेंगे। कभी हार मत मानना।”

उसके शब्द मुकुंद के लिए मरहम जैसे थे।


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उस रात मुकुंद ने अपने diary में लिखा—
“मुश्किलें चाहे जितनी आएँ, मैं हार नहीं मानूँगा। यह सफ़र मेरा है, और मुझे ही इसे पूरा करना है। लेकिन अब मैं अकेला नहीं हूँ—मेरे पास दोस्त भी हैं, और उम्मीद भी।”

और यहीं से उसकी journey ने एक नया मोड़ लिया—संघर्ष और दोस्ती का संगम।


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