Antarnihit - 25 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 25

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अन्तर्निहित - 25

[25]

शैल के फोन की घंटी बजी, “महाशय, यहाँ वत्सर के मंदिर से सारे पत्रकारों को तो वत्सर ने भगा दिया है किन्तु वह दो वामिए  वत्सर के साथ हैं। अभी अभी प्रांगण में आए हैं। आगे क्या आदेश है?” मोहनन ने कहा। 

“तुम उन पर दृष्टि बनाये रखो। पूरी बातचीत का वीडियो ले लो। और लता कहाँ है?” शैल ने कहा। 

“वह मेरे साथ ही है।” 

“ठीक है, काम पर लग जाओ।” शैल ने फोन काट दिया। लता के साथ मोहनन ने अपना कार्य आरंभ कर दिया। वत्सर के साथ बैठे सपन और निहारिका पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। 

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“शैल, तुमने सपन, निहारिका और वकार को छोड़ दिया तो वह अब वत्सर के पास पहुँच गए।” सारा ने कहा। 

“वह तो पत्रकारों की सारी भीड़ भी ले गए थे साथ में।”

“वत्सर ने पत्रकारों को क्या बताया?”

“वत्सर ने कुछ भी नहीं बताया। सभी को भगा दिया।”

“ठीक किया वत्सर ने। क्या अभी भी हम उन लोगों को पकड़ना नहीं चाहेंगे?”

“नहीं साराजी, उन्हें अभी तो अनेक भूलें करनी हैं। ऐसा करना उनका स्वभाव है।”

“तो पकड़ लेते हैं। बंद कर देते हैं कारागृह में।”

“ऐसा करने से कोई लाभ नहीं है।” 

“ऐसा क्यों?”

“उसे पकड़ तो लेंगे किन्तु दूसरे दिन ही न्यायालय उन्हें मुक्त कर देगी। ऊपर से हम पर आरोप भी लगा दिया जाएगा कि हम उस घटना का रहस्य उद्घाटित करने में असफल रहे हैं इसलिए निर्दोषों का उत्पीड़न कर रहे हैं। इससे हमारा ही अपयश और अपमान होगा।”

“वे निर्दोष कहाँ हैं? न्यायालय से कैसे मुक्त हो जाएंगे?”

“यहाँ का न्यायालय भी वामपंथियों का है, अल्पसंखयकों का है। यहाँ न्याय व्यक्ति का धर्म, विचारधारा आदि को देखकर होता है। तथ्यों, साक्ष्यों और प्रमाणों का कोई अर्थ नहीं है।”

“यह तो दु:खद है।”

“दु:खद ही नहीं, चिंता का विषय भी है।” शैल ने एक नि:श्वास भरा। 

शैल की बात सुनकर सारा विचार में पड गई। कक्ष की हवा भारी हो गई। दोनों मौन हो गए। 

सहसा शैल के फोन में घंटी बजी।  

“शैल जी, मैंने पूरा वीडियो आपको प्रेषित किया है, देख लो। अब हमारे लिए क्या आज्ञा है?”

“आप दोनों उन दोनों पर दृष्टि बनाये रखो। राजीव को वत्सर पर दृष्टि रखने को कह देना।”

शैल ने फोन काट दिया। 

“शैल, क्या है?”

“सारा जी, मोहनन और लता निरंतर सपन – निहारिका पर दृष्टि रख रहे हैं। मुक्त होकर भी दोनों हमारी दृष्टि के कारा में ही हैं। उनकी क्षण क्षण की गतिविधि का हमें संज्ञान प्राप्त होता रहता है। आज वे वत्सर से बात कर अभी अभी वत्सर के गाँव से निकले हैं। मोहनन ने उसका वीडियो भेजा है। देखते हैं क्या हुआ है।”

शैल ने वीडियो चलाया। 

“वत्सर, हमें ज्ञात है कि शैल को तुम पर संदेह है कि तुमने ही उस लड़की की हत्या की है।” सपन कह रहा था।  

“मैंने?”

“यह मैं नहीं कह रहा हूँ। ऐसा शैल मान रहा है।”

“किन्तु मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है।”

“हम जानते हैं कि तुम ऐसा नहीं कर सकते।” निहारिका ने बात की डोर अपने हाथ में ली। 

“इसीलिए तो हमने पत्रकारों को बुलाया था कि तुम अपना पक्ष सारे संसार के सम्मुख रख सको। तुमने तो उन लोगों को ही भगा दिया।” सपन ने कहा, क्षणभर रुका। वत्सर के मुख पर बदलते भावों को देखने की अपेक्षा थी उसे किन्तु वत्सर निर्लेप था। “वत्सर तुम मेरी बात समझ रहे हो ना?” सपन ने अपनी बात पूरी की। 

“हाँ, समझ रहा हूँ।”

“तो बुला लूँ उन सबको? सभी यहीं गाँव में ही अभी रुके हैं। मेरे एक संकेत पर सारे यहाँ आ जाएंगे। तुम अपनी बात रखना, अपने आप लो निर्दोष सिद्ध कर देना। पश्चात उसके, कोई पुलिसवाला तुम पर संदेह नहीं करेगा, न ही तुम्हें कोई हाथ लगाएगा। हम सब संभाल लेंगें। तुम्हारे पक्ष में पूरा गेंग खड़ा कर देंगें।” निहारिका ने उत्साह प्रकट कर दिया। 

“मुझ पर आपकी ऐसी कृपा का कारण?”

”वत्सर जी, आप एक कलाकार हो, मैं भी कलाकार हूँ। हमारा परिचय आठ वर्ष से अधिक का है। आप मेरे मित्र हो। इस कारण हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है कि नहीं?” सपन ने कहा। 

“परिचय और मित्रता भिन्न भिन्न बातें हैं। मैं आपका मित्र या आप मेरे मित्र कभी नहीं रहे। उल्टा आप तो मेरी कला से ईर्ष्या करते रहे हो। इतना तो स्मरण होगा ही, सपन जी?”

“वह तो आपकी कला की बात थी, आपसे थोड़े न ईर्ष्या करते हैं सपन जी। हैं न सपनजी?” निहारिका ने बात को संभालना चाह। 

“यही तो मैं कह रहा हूँ जो निहारिका जी ने कहा।”

“मेरे लिए इतना सब कुछ करने से आपको क्या लाभ होगा?”

“एक कलाकार दूसरे कलाकार की सहायता करे यही सबसे बड़ा लाभ।”

“और इससे भारत सरकार, भारत की पुलिस और भारतीय गुप्तचरों की विफलता प्रकट हो जाएगी। पूरे विश्व में इस पर चर्चा होगी। सरकार के विरुद्ध सारा वामपंथ, सभी बुद्धिजीवी, सभी सेकयुलर्स, सभी लिबरल्स , सभी कलाकार, एक हो जाएंगे। हम सरकार को विवश कर देंगे।” निहारिका ने कहा। 

“किस बात के लिए सरकार को विवश करना चाहते हो?” वत्सर ने मार्मिक प्रश्न किया। वत्सर के इस प्रश्न का उत्तर सपन देने ही जा रहा था कि निहारिका ने उसका हाथ दबा दिया, सपन रुक गया। निहारिका ने कहा, “वत्सर जी आप इस स्थिति को समज नहीं पा रहे हो।”

“वह कैसे, निहारिका जी?”

“जब यह सब हो जाएगा तो सारा विश्व आपको जानने लगेगा। बड़े बड़े मंच पर आपको आमंत्रित किया जाएगा। प्रत्येक स्थान पर आपकी ही चर्चा होगी। आपका कितना बड़ा नाम होगा यह सोचा है?” 

“और हमारे लिबरल संगठन में आपको उच्च स्थान मिलेगा।” निहारिका ने नैनों का कटाक्ष करते हुए कहा। 

“उससे क्या होगा?” 

“आप सोच भी नहीं सकते कि आप कहाँ से कहाँ तक पहुँच सकते हो।” निहारिका ने कहा। 

“आप मलाला, अरुंधती रॉय, तीस्ता सेतलवाड, मो. यूनुस, ग्रेटा थनबर्ग आदि को जानते हो? आज वे कहाँ पहुँच गए? एक समय पर वे कुछ भी नहीं थे। यह सब हमारे नेटवर्क से संभव हुआ है। हमने उन्हें सारे विश्व में मंच प्रदान किया। आपको भी यह मंच प्राप्त हो सकता है। कहो, क्या विचार है?” सपन ने अपना दांव चला। 

वत्सर उचित उत्तर देने की लिए, विचार करने के लिए रुका उसे सहमति मानते हुए निहारिका बोली, “तो बुला लें पत्रकारों को?” 

“नहीं। मैं आपकी भांति न तो वामपंथी हूँ, न धर्म निरपेक्ष हूँ, न लिबरल हूँ और न ही तथाकथित बुद्धिजीवी।”

“एक कलाकार होकर भी इन सबका अस्वीकार कर रहे हो? प्रत्येक कलाकार वामपंथी होता ...।”

“बस, आगे कोई बात नहीं। मैं कलाकार अवश्य हूँ किन्तु आपकी भांति असत्य के मार्ग पर चलकर मेरे ही देश को अस्थिर करने की आपकी योजना का हिस्सा नहीं बन सकता। मेरे लिए मेरा देश, मेरा धर्म सर्व प्रथम है, कला नहीं।” वत्सर क्षणभर रुका, सपन – निहारिका के मुख के भाव भावहीन थे। 

“आप दोनों यहाँ से इसी क्षण विदा हो जाइए अन्यथा परिणाम गंभीर होंगे।” वत्सर ने चेतावनी दी। दोनों कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं रहे, अपमानित होकर जाने लगे। 

जाते जाते निहारिका ने कहा, “यदि विचार बदल जाए तो मुझसे इस नंबर पर बात कर लेना। हम शीघ्र ही उपस्थित हो जाएंगे।” निहारिका ने अपना विजीटिंग कार्ड वत्सर के पास छोड़ दिया। वत्सर ने न तो उसे देखा, न ही उन दोनों को। 

मंदिर में प्रवेश कर श्री कृष्ण को प्रणाम कर एक आसन पर ध्यान मग्न होकर वत्सर बैठ गया। निहारिका का विजीटिंग कार्ड 

हवा की तरंगों के साथ कहीं दूर उड गया। 

शैल का वीडियो सम्पन्न हो गया। सारा और शैल ने एक दूसरे को देखा। दोनों कुछ कहना चाहते थे तथापि दोनों मौन रहे। एक दूसरे के बोलने की प्रतीक्षा करने लगे। 

कुछ समय पश्चात सारा ने मौन भंग किया, “मुझे प्रतीत होता है कि इस व्यक्ति में कुछ तो विशेष बात है।”

“क्या बात है?”

“मैं तो इन लोगों की बातों में आ गई थी किन्तु इसने तो उनके उद्देश्यों को एक ही क्षण में परख लिया। ऐसा व्यक्ति किसी की हत्या करेगा ...।”

“ऐसा आप नहीं मानती, हैं न?”

“मेरा तात्पर्य ...।”

“सारा जी, हम पुलिसवाले हैं। हमें प्रत्येक व्यक्ति पर संदेह रखना चाहिए।”

“मैं तो बस ...।”

“आप भारत के पुरुषों के अच्छे व्यवहार से शीघ्र ही पिघल जाती हो। ठीक है किन्तु पुलिसवाले हैं आप यह स्मरण सदैव रखना होगा।” सारा ने उत्तर नहीं दिया।