[27]
“घटना स्थल पर भी कुछ नहीं मिला, शैल?”
“मिलता भी कैसे?”
“क्यों?”
“वह स्थल घटना स्थल है ही नहीं।”
“क्या कह रहे हो? शैल, मृतदेह वहीं से मिला था न? क्या कहीं अन्य स्थल से तो मृतदेह नहीं मिल था?”
“अधीर न हो सारा जी। मैंने यही कहा है कि वह स्थल घटना स्थल नहीं है। घटना स्थल तो अन्यत्र कहीं है।”
“कहाँ है?”
“वही तो हमें खोजना है।”
“जहां से मृतदेह मिला वह स्थल घटना स्थल नहीं है। अन्यत्र जो घटना स्थल है वह कहाँ है वह हम जानते नहीं हैं। क्या है यह सब, शैल?”
“यही तो दुविधा है।”
“क्या उपाय है इस दुविधा का?”
“आरंभ से प्रारंभ करते हैं।” शैल ने कहा, सारा ने पूरा ध्यान शैल की बातों पर केंद्रित कर दिया।
“वह मृतदेह यहाँ तक जल प्रवाह से आया है। अर्थात इसकी मृत्यु अन्यत्र कहीं हुई है और समय के साथ वह नदी के जल में बहकर यहाँ आ गई। नदी के उस बिन्दु पर आकर अटक गई। मृत्यु इस सीमा स्थान पर नहीं हुई है।” शैल रुका, सारा प्रतीक्षा करने लगी।
“मृत्यु का स्थान नदी के किसी तट पर है जो यहाँ से कहीं दूर है। हमें उस स्थान को खोजना पड़ेगा।”
“कैसे खोज पाएंगे?”
“मैं नहीं जानता। मैं प्रयास कर रहा हूँ। आप भी प्रयास करें।” दोनों विचार ग्रस्त हो गए। दोनों ने भोजन किया। पुन: विचार में डूब गए।
“शैल, भोजन के उपरांत का समय कितना मंद गति से बह रहा है!”
“बह तो रहा है। बिना किसी प्रयास के।”
“और बिना किसी उपाय के भी।” सारा ने कहा। शैल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
“उपाय भी मिल जाएगा। उचित समय को आने दो, शैल।” सारा ने बात का संधान किया।
“वह उचित समय आज क्यों नहीं आ रहा? अभी क्यों नहीं आ रहा?”
सारा के पास उसका कोई उत्तर नहीं था। संध्या हो गई। घर जाने का समय हो गया।
“सारा जी, मुझे एक लंबी यात्रा पर चलना है।”
“कैसी यात्रा?”
“हम कल जिस घटना स्थल पर गए थे वहाँ से मेरी यात्रा प्रारंभ होगी और सतलज नदी के प्रवाह के समानांतर चलते रहना है।”
“तो तुम पाकिस्तान जा रहे हो?” सारा ने संशय किया।
“नहीं मैं पाकिस्तान नहीं जा रहा हूँ।”
“तो?”
“नदी का प्रवाह ऊपर से नीचे आ रहा है। मैं नदी के प्रवाह के विरुद्ध नीचे से ऊपर की दिशा में प्रयाण करूंगा। नदी जिस मार्ग से होकर यहाँ तक आई है उस मार्ग पर मैं चलूँगा।”
“कहाँ तक जाओगे?”
“जहां घटना स्थल होगा वहाँ तक।”
“कहाँ है घटना स्थल?”
“कहीं तो होगा। इस नदी के तट पर ही होगा।”
“यदि घटना स्थल नदी के उद्गम बिन्दु पर होगा तो? जानते हो नदी कितनी लंबी है? उसका उद्गम स्थान कहाँ है? वहाँ तक जाने में कितना समय लगेगा? कितना कष्ट होगा? इन सब बातों का विचार और आयोजन किया है तुमने?”
“नहीं। कुछ भी नहीं किया है। मुझे तो यह भी ज्ञात नहीं कि सतलज कहाँ से निकलती है, कितना अंतर बहकर यहाँ तक आती है।”
“रुको। मैं गूगल से नदी के विषय में पूरा ज्ञान ले लेती हूँ।”
“ठीक है। मैं प्रतीक्षा करता हूँ। कल बता देना।”
“श्रीमान, यदि कल निकलना है तो ज्ञान आज ही होना चाहिए, अभी ही होना चाहिए।”
“तो अभी बता दो।” शैल रुक गया। सारा गूगल पर सतलज नदी को खोजने लगी।
“सुनो, शैल। यह नदी का स्रोत कैलास पर्वत के समीप स्थित राक्षस ताल है। वहाँ से बहती हुई सतलज हिमाचल प्रदेश से पंजाब होती हुई पाकिस्तान तक जाती है। इसका मार्ग 1500 किलो मीटर लंबा है। इसके मार्ग में कुछ पहाड़ी क्षेत्र है, कुछ जंगल का विस्तार भी है। बाकी क्षेत्र में मैदान है।”
“ठीक है। माहिती के लिए धन्यवाद।”
“तो कहो कैसे चलना है हमें? कब चलना है? कितने दिन लग सकते हैं? जीप से चलें तो आठ दस दिन में काम हो जाएगा।”
“सारा जी, वहाँ पर्यटन हेतु नही जा रहा हूँ। अन्वेषण करना है।”
“इतना ध्यान है मुझे।”
“जीप से चलने से मूल घटना स्थल कहीं छूट जाएगा।”
“तो? क्या विचार है?”
“पैदल चलना होगा, नदी के प्रवाह के साथ साथ। ऊर्ध्व दिशा में, प्रवाह की उलटी दिशा में।”
“इससे क्या होगा?”
“हमें यह ज्ञात नहीं कि उस लड़की ने अपनी अंतिम सांस किस स्थान पर ली थी? कब ली थी?”
“अर्थात अंधेरे में तीर चलाना है?”
“और कोई उपाय भी तो नहीं। जब तक मूल घटना स्थल नहीं मिल जाता, किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते। न ही उस रहस्य को पा अकते हैं।”
“नदी की परिक्रमा करनी होगी?”
“यही समझ लो।”
“यह अत्यंत कठिन, दुष्कर एवं अनंत समय तक करते रहनेवाला प्रयास है जिसके पश्चात भी कार्य की सफलता की कोई निश्चितता नहीं है। यदि यही शेष मार्ग है तो यही सही। हमारे भाग्य में ही ऐसा कार्य लिखा है तो हमें यह कार्य करना पड़ेगा। चलो हम पैदल ही चलते हैं।” सारा ने गहरी सांस ली और बैठ गई।
“सारा जी, हम नहीं, मैं ही चलूँगा, अकेला ही।”
“क्यों? मैं भी चलना चाहती हूँ। मुझे साथ ले चलो।”
“मार्ग अति कठिन है, दुष्कर है, लंबा है। आप …।”
“मैं पुलिसवाली हूँ। तुम्हें इतना तो स्मरण होगा ही।”
“किन्तु आप ….।”
“यही न की मैं एक स्त्री हूँ? मैं तुम्हाररे साथ चल रही हूँ। इस रहस्य को हमें साथ मिलकर पाना है तो मैं तो सदैव साथ ही रहूँगी।”
“ओह!”
“चलो चलने की तैयारी करते हैं। आओ, बैठो। योजना बताते हैं।”
“आप बड़ी हठीली हैं, सारा जी।”
“जगत की सभी स्त्रीयां हठीली ही होती हैं। उसे हठ करने के लिए योग्य व्यक्ति मिलनी चाहिए।” सारा ने शैल को ज्ञान बाँट दिया।
“मार्ग में कुछ स्थान पर गाँव आते हैं, कुछ स्थान पर जंगल। कुछ स्थान पूर्ण रूप से निर्जन भी हैं। मेरा मानना है कि जहां गाँव हैं, मानव बसे हैं वहाँ किसी ने उस लड़की की हत्या नहीं की होगी। या तो जंगल में या तो निर्जन स्थान पर किसी ने लड़की को मारा होगा।” शैल ने संभावनाएं प्रकट की।
“शैल, एक बात कहूँ? अप्रसन्न नहीं होंगे?”
“आप मुझ से वरिष्ठ हैं, कहो।”
“हम हर बार उस मृतदेह के लिए ‘उस लड़की’ का शब्द प्रयोग करते हैं। क्या यह उचित होगा आप जैसे नारी सम्मान करने वाले व्यक्ति के लिए?”
“नहीं। किन्तु हम उसका नाम भी नहीं जानते। ऐसी स्थिति में और क्या कर सकते हैं?”
“उसे हम अपनी तरफ से तो कोई नाम दे सकते हैं न?”
“तो उसे अनामिका कहें?”
“नहीं। अनामिका तो वही हो गया – नाम विहीन!”
“तो?”
“मेरे मन में एक नाम आ रहा है जो यूरोपीय देश में भी, भारत में भी, हिन्दू में भी, मुस्लिम में भी, ख्रिस्तीयों में भी प्रचलित है।”
“कौन स नाम?”
“मीरा। उसे हम मीरा नाम दे दें?”
“मीरा?”
“हाँ। कैसा लगा यह नाम?”
“वाह। मीरा नाम सुंदर है। आज से ही हम उस घटना को मीरा नाम देते हैं। सभी स्थान पर हम मीरा ही कहेंगे, मीरा ही लिखेंगे।”
“किन्तु एक समस्या है।”
“कैसी समस्या?”
“हमारे मन से हम इस घटना को मीरा नाम नहीं दे सकते।”
“क्यों?”
“इसके लिए हमें अनुमति लेनी पड़ेगी।”
“उसी से?”
“और नहीं तो क्या?”
“ठीक है, मांग लेना अनुमति। दे तो भी ठीक है, न दे तो भी ठीक। हम तो उसे मीरा ही कहेंगे। क्या विचार है तुम्हारा?
चलो छोड़। कल से यात्रा आरंभ करते हैं।”
“कल से नहीं।”
“क्यों?”
“इसके लिए भी तो अनुमति लेनी पड़ेगी।” शैल के शब्दों का व्यंग सारा समझती थी। हंस पड़ी। शैल भी हंसने लगा।