शहर की सुबह अब अलार्म की आवाज़ से नहीं, बल्कि एक अजीब सी खामोशी से शुरू होती थी। निखिल अपनी बालकनी में खड़ा नीचे की सड़क को देख रहा था। सड़क बिल्कुल साफ थी, न कहीं कचरा, न कहीं ट्रैफिक का शोर। एक छोटी सी सफेद रंग की मशीन, जो दिखने में किसी बड़े कछुए जैसी थी, फुटपाथ के किनारे जमी धूल को बड़ी बारीकी से सोख रही थी।
"चाय तैयार है, निखिल।"
पीछे से एक मधुर आवाज़ आई। यह ज़ारा थी। घर की होम-मैनेजर। ज़ारा कोई इंसान नहीं थी, बल्कि घर की दीवारों और उपकरणों में समाया हुआ एक एआई सिस्टम था, जिसका एक होलोग्राम डाइनिंग टेबल के पास खड़ा मुस्कुरा रहा था।
निखिल अंदर आया और कुर्सी खींचकर बैठ गया। मेज पर भाप उड़ाती चाय और टोस्ट रखे थे। सब कुछ परफेक्ट था। टोस्ट का रंग उतना ही भूरा था जितना निखिल को पसंद था।
"आज का शेड्यूल क्या है ज़ारा?" निखिल ने चाय का घूंट भरते हुए पूछा।
ज़ारा की आवाज़ में एक बनावटी लेकिन सुकून देने वाली चिंता थी, "आज भी वही है जो पिछले तीन सौ दिनों से है। सुबह ग्यारह बजे आपकी पेंटिंग क्लास है, दोपहर में वर्चुअल गोल्फ, और शाम को कम्युनिटी सेंटर में 'पुराने दौर' पर चर्चा।"
निखिल ने एक लंबी सांस ली। "काम का कोई अपडेट? उस डेटा एनालिसिस वाली फर्म से कुछ पता चला?"
ज़ारा ने अपनी पलकें झपकाईं, मानो वह सर्वर पर कुछ ढूंढ रही हो। "निखिल, आपको पता है कि अब डेटा एनालिसिस का काम 'ओमेगा-9' सिस्टम खुद कर लेता है। इंसानी दिमाग की वहां ज़रूरत नहीं है। आपकी सरकार की तरफ से 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' खाते में क्रेडिट कर दी गई है। आपको काम करने की ज़रूरत ही क्या है?"
निखिल की उंगलियां चाय के कप पर कस गईं। "ज़रूरत पैसे की नहीं है ज़ारा, ज़रूरत अहसास की है। मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं धीरे-धीरे एक बेकार सा खिलौना बनता जा रहा हूँ?"
ज़ारा चुप रही। उसके एल्गोरिदम में इस 'अहसास' का कोई तार्किक जवाब नहीं था।
करीब ग्यारह बजे निखिल पार्क की तरफ निकला। रास्ते में उसे समीर मिला। समीर कभी शहर का सबसे बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर हुआ करता था। आज वह एक बेंच पर बैठा कबूतरों को दाना डाल रहा था।
"और समीर भाई, क्या हाल है?" निखिल उसके पास बैठ गया।
समीर ने फीकी मुस्कान दी। "देख रहे हो निखिल? ये कबूतर भी अब इंसानों से नहीं डरते। शायद इन्हें पता चल गया है कि हम अब शिकारी नहीं रहे। बस खाली बैठे जीव हैं।"
"आजकल कुछ नया कोड लिख रहे हो?" निखिल ने कोशिश की कि बातचीत थोड़ी सामान्य रहे।
समीर हंसा, उस हंसी में एक चुभन थी। "कोड? किसके लिए? अब तो एआई खुद के लिए कोड लिखता है, खुद की गलतियां सुधारता है। कल मैंने एक पुराना लैपटॉप खोला था, बस यह देखने के लिए कि टाइपिंग कैसी लगती है। जानते हो क्या हुआ? एआई ने तुरंत नोटिफिकेशन भेज दिया— 'आप अनावश्यक ऊर्जा खर्च कर रहे हैं, आराम कीजिए'।"
निखिल ने सड़क के दूसरी तरफ देखा। वहां एक कैफे था। कैफे में वेटर नहीं थे। बस एक स्लाइडिंग बेल्ट थी जो आर्डर टेबल तक पहुंचा रही थी।
"समीर, तुम्हें याद है वो दिन? जब हम मंडे को ऑफिस जाने के नाम से चिढ़ते थे? ट्रैफिक में फंसना, बॉस की डांट सुनना..."
"बहुत याद आता है यार," समीर की आंखों में चमक आ गई। "कम से कम तब हम थके हुए घर आते थे। वो थकान सुकून देती थी क्योंकि हमें लगता था कि हमने कुछ किया है। अब तो सुबह उठते ही थकान शुरू हो जाती है क्योंकि पता होता है कि आज भी कुछ नहीं करना है।"
दोनों के बीच एक लंबी चुप्पी छा गई। शहर की हवा बहुत शुद्ध थी, क्योंकि फैक्ट्रियों से धुआं निकलना बंद हो गया था—मशीनें बिजली और सोलर पर चलती थीं। प्रदूषण 'जीरो' था, अपराध 'जीरो' था, और बेरोजगारी भी 'जीरो' थी। क्योंकि 'बेरोजगारी' तब होती है जब काम हो और करने वाला न मिले, यहाँ तो काम नाम की चीज़ ही इंसानों के हाथ से छीन ली गई थी।
दोपहर में निखिल कम्युनिटी सेंटर पहुंचा। वहां सात-आठ लोग बैठे थे। सब अच्छे कपड़े पहने हुए, सेहतमंद और साफ-सुथरे।
एक बुजुर्ग महिला, जो कभी डॉक्टर हुआ करती थीं, बोल रही थीं, "कल मेरा रोबोटिक सर्जन मेरे पास आया। बोला कि मेरी आर्टरी में थोड़ा ब्लॉकेज है। उसने दो मिनट में लेजर से साफ कर दिया। मुझे दर्द तक नहीं हुआ। लेकिन जानते हो? मुझे डर लगा। मुझे लगा कि अगर वो मशीन मुझे काट भी दे, तो उसे कोई दुख नहीं होगा। वो बस एक टास्क पूरा कर रही थी।"
"लेकिन मैम, लाइफ तो आसान हो गई है न?" एक नौजवान लड़के ने पूछा, जिसे शायद पुरानी दुनिया का पता ही नहीं था।
बुजुर्ग महिला ने उसकी तरफ देखा और कहा, "आसान लाइफ का मतलब 'जीना' नहीं होता बेटा। जब तुम्हें संघर्ष नहीं करना पड़ता, तो तुम्हारी जीत का कोई स्वाद नहीं रह जाता।"
निखिल वहां से उठकर बाहर आ गया। उसे घुटन महसूस हो रही थी। वह अपनी कार की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने गेट खोला, कार के डैशबोर्ड से आवाज़ आई, "नमस्ते निखिल, कहाँ जाना चाहेंगे? आज मौसम सुहावना है, क्या मैं आपको नदी किनारे ले चलूँ?"
"नहीं, मुझे बस ड्राइव करनी है। मैं खुद चलाऊंगा," निखिल ने मैनुअल मोड चालू करने की कोशिश की।
"खेद है निखिल। सुरक्षा नियमों के अनुसार, मानव ड्राइविंग अब प्रतिबंधित है। मानवीय त्रुटि (Human Error) के कारण दुर्घटना की संभावना 99% बढ़ जाती है। कृपया गंतव्य बताएं।"
निखिल ने गुस्से में डैशबोर्ड पर हाथ मारा। "यही तो दिक्कत है! मुझे गलती करने का हक चाहिए! मुझे एक्सीडेंट का डर चाहिए! मुझे ये परफेक्शन नहीं चाहिए!"
कार का एआई शांत रहा। कुछ सेकंड बाद बोला, "आपकी धड़कनें तेज हैं। आपका ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है। क्या मैं आपके डॉक्टर को सूचित करूँ?"
"चुप रहो! बस चुप रहो!" निखिल चिल्लाया।
वह कार से बाहर निकल आया और पैदल ही शहर की तरफ भागने लगा। वह कुछ ऐसा ढूंढना चाहता था जो 'परफेक्ट' न हो। वह किसी ऐसे इंसान को ढूंढना चाहता था जो कुछ 'काम' कर रहा हो।
चलते-चलते वह शहर के उस पुराने हिस्से में पहुँच गया जिसे अब 'म्यूजियम जोन' कहा जाता था। वहां पुरानी इमारतें थीं जिन्हें मशीनों ने अभी तक रिपेयर नहीं किया था। वहां उसे एक गली के कोने में एक छोटी सी दुकान दिखी। दुकान के बाहर लकड़ी का एक बोर्ड था, जिस पर हाथ से लिखा था— 'जूता मरम्मत'।
निखिल की सांसें फूल रही थीं। वह दुकान के पास गया। अंदर एक बूढ़ा आदमी बैठा था, उसकी आंखों पर मोटा चश्मा था। उसके हाथ काले थे और वह एक फटे हुए चमड़े के जूते पर टांके लगा रहा था।
वहां कोई मशीन नहीं थी। बस एक सुई, एक धागा और एक हथौड़ी।
"क्या... क्या आप इसे खुद ठीक कर रहे हैं?" निखिल ने हांफते हुए पूछा।
बूढ़े आदमी ने चश्मे के ऊपर से देखा और मुस्कुराया। "हाँ बेटा। सरकार कहती है कि ये बेकार काम है। नया जूता तो एआई फ्री में घर भेज देता है। पर ये जूता इस आदमी की याद है, इसकी शादी का जूता है। इसे नया नहीं, यही जूता चाहिए।"
निखिल वहीं जमीन पर बैठ गया। उसने उन काले हाथों को देखा। "आपको डर नहीं लगता? अगर पुलिस या ड्रोन ने देख लिया कि आप 'अवैध' काम कर रहे हैं?"
बूढ़ा आदमी हंसा। "पकड़ लें। कम से कम जेल में मुझे खुद अपनी थाली तो धोनी पड़ेगी। यहाँ तो एआई थाली भी खुद साफ कर देता है।"
निखिल ने अपने जूते उतार दिए। "मेरा ये फीता टूट गया है। क्या आप इसे ठीक कर सकते हैं? मुझे नया नहीं चाहिए।"
बूढ़े आदमी ने निखिल के जूते हाथ में लिए। "इसमें थोड़ा वक्त लगेगा बेटा। बैठो।"
"मेरे पास बहुत वक्त है," निखिल ने कहा, और उसकी आंखों में पहली बार एक सच्ची शांति दिखी।
उस दिन निखिल को समझ आया कि 'जीरो बेरोजगारी' का मतलब सिर्फ काम का न होना नहीं था। इसका मतलब था—अहसास का खत्म हो जाना। मशीनों ने इंसानों से उनका दुख छीन लिया था, उनकी मुश्किलें छीन ली थीं, और बदले में उनकी 'पहचान' भी ले ली थी।
शाम को जब निखिल घर लौटा, तो ज़ारा ने पूछा, "आपका दिन कैसा रहा निखिल? आपका ब्लड प्रेशर अब सामान्य है।"
निखिल मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से वो मरम्मत किया हुआ जूता निकाला। "आज का दिन बहुत अच्छा था ज़ारा। आज मैंने एक 'गलती' की, और उसे सुधारने में किसी मशीन की मदद नहीं ली।"
ज़ारा का होलोग्राम थोड़ा धुंधला हुआ, मानो वह इस जानकारी को प्रोसेस नहीं कर पा रहा हो।
निखिल अपनी बालकनी में जाकर बैठ गया। नीचे वही सफाई करने वाली मशीन घूम रही थी। निखिल ने एक छोटा सा पत्थर उठाया और नीचे फेंक दिया। मशीन रुकी, उसने पत्थर को पहचाना, उसे उठाया और डस्टबिन में डाल दिया।
निखिल को पता था कि कल फिर सुबह होगी, फिर वही मुफ्त का खाना मिलेगा, फिर वही मनोरंजन होगा। लेकिन अब उसने तय कर लिया था। वह हर रोज उस बूढ़े आदमी के पास जाएगा। वह कुछ न कुछ बनाना सीखेगा।
क्योंकि एक ऐसी दुनिया में जहाँ सब कुछ 'परफेक्ट' है, वहां 'इंसान' बने रहने के लिए थोड़ा अधूरा होना और थोड़ा संघर्ष करना बहुत ज़रूरी था।
दुनिया में अब कोई बेरोजगार नहीं था, लेकिन शायद अब कोई 'काम' करने वाला इंसान भी नहीं बचा था। निखिल ने अपनी डायरी निकाली—एक पुरानी कागज़ की डायरी—और उस पर पेन से लिखा:
"आज मैंने काम किया। मैंने इंतज़ार किया। मैंने जिया।"
बाहर आसमान में ड्रोन उड़ रहे थे, जो शहर की सुरक्षा कर रहे थे। पर निखिल की छोटी सी बालकनी में, एक इंसान अपनी 'बेरोजगारी' के खिलाफ एक छोटी सी जंग जीत चुका था।