Mout ki Dastak - 17 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 17

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मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 17

भाग 1: पुरानी यादों का बोझ
विक्रम एक सफल आर्किटेक्ट था, जिसे पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक ढांचों से गहरा लगाव था। जब उसे पता चला कि उसके दादाजी ने पुश्तैनी गाँव 'रुद्रपुर' में उसके लिए एक पुरानी हवेली छोड़ी है, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह शहर की भीड़भाड़ से थक चुका था और कुछ समय शांति में बिताना चाहता था।
रुद्रपुर एक ऐसा गाँव था जहाँ सूरज ढलते ही सन्नाटा पसर जाता था। जब विक्रम अपनी कार से वहाँ पहुँचा, तो गाँव वालों की नज़रें उस पर टिकी थीं—उन नज़रों में स्वागत कम और चेतावनी ज़्यादा थी। हवेली गाँव के एक ऊँचे टीले पर स्थित थी, जिसके चारों ओर पुराने बरगद के पेड़ ऐसे झुके थे जैसे उसे बाहरी दुनिया से छिपा रहे हों।
भाग 2: हवेली का रहस्यमयी कोना
हवेली के अंदर कदम रखते ही विक्रम को एक ठंडी सिहरन महसूस हुई। घर के अंदर की हवा भारी थी, जैसे सदियों की धूल और नमी उसमें समा गई हो। सफाई के दौरान, विक्रम को तहखाने की ओर जाने वाली एक संकरी सीढ़ी मिली। तहखाना अंधेरा और बदबूदार था, लेकिन वहां के कोने में एक चीज़ ने उसका ध्यान खींचा।
वह एक विशाल सागवान का सन्दूक था। उस पर पीतल की नक्काशी की गई थी और एक भारी जंजीर से उसे जकड़ा गया था। सन्दूक के ऊपर एक अजीब सा चिह्न बना था, जो किसी प्राचीन भाषा का लग रहा था। विक्रम की जिज्ञासा ने उसे घेर लिया। उसने एक भारी हथौड़े से उस जंजीर को तोड़ दिया।
जैसे ही जंजीर टूटी, तहखाने की एकमात्र खिड़की का कांच बिना किसी कारण के चटक गया। विक्रम को लगा जैसे किसी ने उसके कान के पास ठंडी सांस छोड़ी हो। सन्दूक के अंदर कुछ पुराने कपड़े, एक टूटा हुआ आईना और एक काले मखमल की पोटली थी।
भाग 3: रातों का सन्नाटा और आहटें
पहली रात सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन दूसरी रात से अजीब घटनाएं शुरू हो गईं। विक्रम अपने कमरे में सो रहा था कि अचानक उसे हवेली के आंगन में किसी के नाचने की आवाज सुनाई दी। छम... छम... छम...
वह चौंक कर उठा और टॉर्च लेकर आंगन में गया। वहां कोई नहीं था, लेकिन फर्श पर गीली मिट्टी के पैरों के निशान थे। वे निशान छोटे थे, जैसे किसी बच्चे या किसी ठिगने कद के जीव के हों। विक्रम ने सोचा कि शायद कोई जानवर अंदर आ गया होगा।
अगली रात, जब वह पढ़ रहा था, उसे अपनी मेज के नीचे से एक सिसकी सुनाई दी। उसने झुककर देखा, तो वहां कुछ नहीं था। लेकिन जैसे ही वह सीधा हुआ, उसने कमरे के शीशे में देखा—उसके पीछे एक साया खड़ा था। वह साया धुंधला था, लेकिन उसकी आंखें चमक रही थीं। विक्रम पलटा, तो वहां कोई नहीं था। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
भाग 4: सन्दूक का खौफनाक सच
विक्रम ने तय किया कि वह इस हवेली का इतिहास जानेगा। वह गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, रहमत चाचा के पास गया। सन्दूक का जिक्र सुनते ही रहमत चाचा का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने कांपती आवाज में बताया, "बेटा, वह सन्दूक नहीं, एक कैदखाना है। तुम्हारे परदादा के समय में, गाँव में एक तांत्रिक आया था जिसने एक 'पिशाचिनी' को वश में किया था। वह रूह इंसानों की आवाज़ चुरा लेती थी और उन्हें पागल कर देती थी। अंत में, उसे उसी सन्दूक में कैद किया गया था। उसे कभी नहीं खोलना चाहिए था!"
विक्रम के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने वह जंजीर तोड़ दी थी जिसने उस बला को रोक रखा था।
भाग 5: रूह का खेल
उस रात, जब विक्रम हवेली लौटा, तो उसे अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी। "विक्रम... बेटा, यहाँ आओ।"
वह चौंक गया। उसकी माँ तो शहर में थी! वह आवाज़ तहखाने से आ रही थी। विक्रम सम्मोहित होकर सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगा। वह जानता था कि यह धोखा है, लेकिन आवाज़ इतनी सजीव थी कि उसके कदम नहीं रुक रहे थे।
तहखाने में पहुँचते ही उसने देखा कि वह सन्दूक खुला हुआ था और उसके अंदर से एक काला धुआं निकल रहा था। अचानक, हवेली के सभी दरवाजे अपने आप बंद हो गए। टॉर्च की रोशनी धुंधली पड़ने लगी।
वह साया अब उसके सामने था। उसकी कोई त्वचा नहीं थी, बस हड्डियों का ढांचा और लंबे, काले नाखून थे। उसने विक्रम का नाम पुकारा, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ विक्रम की अपनी आवाज़ जैसी थी!
"तुम्हारी आवाज़ अब मेरी है," साये ने फुसफुसाया।
भाग 6: अंतिम संघर्ष
विक्रम ने महसूस किया कि वह बोल नहीं पा रहा है। उसकी आवाज़ उसके गले में ही घुट रही थी। उसने देखा कि वह रूह धीरे-धीरे उसका रूप ले रही थी। वह समझ गया कि अगर यह रूह पूरी तरह बाहर निकल गई, तो वह गाँव में तबाही मचा देगी।
उसने पास पड़े उस टूटे हुए आईने को उठाया जो सन्दूक में मिला था। उसे याद आया कि तंत्र-विद्या में आईना रूहों को कैद करने का काम करता है। उसने अपनी पूरी मानसिक शक्ति बटोरी और रूह की आंखों में देखते हुए आईने को उसकी ओर कर दिया।
एक भयानक चीख गूंजी, जिससे हवेली की दीवारें दरकने लगीं। वह साया आईने की गहराई में खिंचने लगा। विक्रम ने जल्दी से सन्दूक का ढक्कन बंद किया और उस पर वही टूटी हुई जंजीर लपेट दी। वह पूरी रात सन्दूक के ऊपर बैठकर प्रार्थना करता रहा।
निष्कर्ष: एक अधूरा अंत
सुबह होते ही विक्रम ने मजदूरों को बुलाया और उस तहखाने को ईंट और सीमेंट से हमेशा के लिए चुनवा दिया। उसने वह हवेली छोड़ दी और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
गाँव वाले कहते हैं कि आज भी अमावस की रात को उस टीले से विक्रम की आवाज़ सुनाई देती है, जो राहगीरों को अंदर बुलाती है। लेकिन वह विक्रम नहीं, बल्कि वह रूह है जो आज भी उस दीवार के पीछे अपनी अगली शिकार की प्रतीक्षा कर रही है