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“क्या तुमने मीरा की हत्या की है?” न्यायाधिस ने पूछा।
“जी नहीं।” वत्सर ने कहा।
“क्या तुम मीरा को जानते हो?”
“नहीं।”
“कपिल महोदय, आपको क्यों लगता है कि मीरा की हत्या वत्सर ने की है? कोई प्रमाण?”
“जी, है न?”
“प्रस्तुत करो।” कपिल ने घटना स्थल के विविध चित्र – चलचित्र न्यायाधीश के समक्ष रखे। न्यायाधीश ने उसे ध्यान से देखा।
“इस चित्र और चलचित्र में ऐसा विशेष क्या है जो प्रमाण हो?”
“प्रमाण यह चित्र – चलचित्र नहीं है। प्रमाण प्रस्तुत करने से पूर्व यह सब देख लेना आवश्यक था।”
“मान लिया। अब प्रमाण प्रस्तुत कीजिए।”
“अब जो प्रस्तुत करूंगा उस पर ध्यान देना आवश्यक है। यह चलचित्र एक शिल्प का है। उस शिल्प में ही सारे प्रमाण छिपे हैं।” कपिल ने येला की शिल्पशाला में स्थित वत्सर के शिल्प का चलचित्र प्रस्तुत किया। अस्सी सेकंड के चलचित्र के सम्पन्न होने पर कपिल बोला, “यहाँ इसे रोकता हूँ। इस शिल्प को देखो।”
सारा सभाखण्ड निश्चल होकर उस शिल्प को देखने लगे।
“इस शिल्प में एक द्रश्य है – नदी का प्रवाह है। प्रवाह के मध्य में दो देशों की सीमा है। एक तरफ भारत तो दूसरी तरफ पाकिस्तान लिखा हुआ है। नदी का नाम भी सतलुज लिखा हुआ है। उस नदी में एक युवती का मृतदेह भी है जो आधा भारत की सीमा में और आधा पाकिस्तान की सीमा में है।” कपिल क्षणभर रुका। सभी का ध्यान स्थिर हुए उस शिल्प के चित्र पर था। सभी अवाक थे। तभी न्यायाधीश ने कहा, “यह दिखाकर आप क्या सिद्ध करना चाहते हो, श्रीमान कपिल?”
“यह शिल्प में जो दृश्य है वही दृश्य मीरा घटना में सीमा पर वास्तविक रूप में प्राप्त हुआ है। वैसी ही घटना हुई है।”
“ठीक है। उससे क्या?”
“महाशय, वह शिल्प के शिल्पकार और कोई नहीं किन्तु वत्सर ही है।”
“क्या यह शिल्प तुमने बनाया है?” वत्सर ने न्यायाधीश के प्रश्न का उत्तर दिया, “जी, हाँ।”
“कब बनाया? मृतदेह मिलने के पश्चात?”
“नहीं महाशय, वत्सर ने यह शिल्प आज से प्राय: आठ वर्ष पूर्व बनाया है।”
“क्या यह सत्य है, वत्सर?”
“जी, यह सत्य है।”
“आठ वर्ष पूर्व ऐसा शिल्प बनाने का कारण?”
“यह केवल एक कलाकृति ही है, उससे अधिक कुछ नहीं, महाशय।”
“नहीं महाशय, यह असत्य कह रहा है। सत्य कुछ और ही है।” कपिल ने कहा।
“क्या है सत्य? श्रीमान कपिल?”
“यही कि वत्सर ने मीरा की हत्या की और वर्षों तक उसके मृतदेह को कहीं छिपा कर रखा। पश्चात ऐसा शिल्प रचकर विश्व के प्रसिद्ध शिल्पकारों में अपना नाम, अपनी कीर्ति बना ली। अब आठ वर्ष का समय व्यतीत हो जाने पर मृतदेह को सतलज नदी में छोड़ दिया। किन्तु नियति कहो या चमत्कार, मृतदेह नदी में ठीक उसी प्रकार से अटक गया, जिस प्रकार मृतदेह उस शिल्प में दिख रहा है।”
“वत्सर, क्या ऐसा ही हुआ है?”
“जी नहीं।”
“कैसे नहीं? सभी संकेत तो यही कह रहे हैं, वत्सर।” नयाधीश ने कहा।
“यही तो मैं कह रहा हूँ, महाशय। इससे स्पष्ट रूप से सिद्ध हो रहा है कि यह हत्या वत्सर ने ही की है।
“वत्सर, तुम क्या कहना चाहोगे?”
“मीरा की हत्या मैंने की है या हत्या के पश्चात मृतदेह को नदी में मैंने छोड़ दिया है यह दोनों बात सत्य नहीं है। पिछले आठ वर्षों से इस घटना होने तक मैं अपने गाँव से बाहर कहीं नहीं गया। तो मैं कैसे किसी मृतदेह को नदी में छोड़ सकता हूँ? मैंने उस नदी को, उस स्थान को भी कभी नहीं देखा।”
“महाशय, चलो मान लिया कि वत्सर नदी तक नहीं गया। किन्तु वत्सर के लिए कोई और उस काम को कर सकता है न?”
“और कोई से आपका तात्पर्य क्या है? क्या आप उस कोई और को जानते हो? किसी ने उस मृतदेह को किसी और के द्वारा नदी में रखते हुए देखा है?” नयाधीश ने पूछा।
“नहीं महाशय, यह तो केवल मेरा अनुमान है।”
“कपिल महोदय, आप वरिष्ठ अधिवक्ता हो। आपको इतना ज्ञान तो है ही कि अनुमन पर न्यायालय नहीं चलते, न ही न्याय होता है।”
“क्षमा चाहता हूँ। ऐसी भूल अब नहीं होगी।”
“ठीक है, इस बात का ध्यान रखना।”
कपिल ने सम्मति में सिर हिलाया।
“इस बात का क्या तर्क है आपके पास कि नदी के प्रचंड प्रवाह में यह मृतदेह ठीक दोनों देशों की सीमा पर आकर ही कैसे रुक गया? इतने प्रचंड वेगवाले पानी में भारी से भारी वस्तु भी बह जाती है।”
“जी, कोई तर्क नहीं है।”
“कपिल महोदय, बिना किसी आधार के, बिना किसी प्रमाण के किसी निर्दोष पर अभियोग क्यों कर रहे हो?”
“वह शिल्प ही एक मात्र प्रमाण है, एक मात्र कड़ी है जिसके आधार पर यह सिद्ध हो सकता है कि वत्सर ने ही मीरा की हत्या की है।”
“महोदय, क्या वास्तव में यह शिल्प ही है या किसी तकनीक से रचा हुआ है यह चलचित्र?” न्यायाधीश ने संदेह प्रकट किया।
“यह शिल्प वास्तविक ही है, कोई भ्रम नहीं है। और यह देखो शिल्प के साथ खड़े शिल्पकार वत्सर को।” कपिल ने शिल्प के साथ खड़े वत्सर का चित्र प्रस्तुत किया। “महाशय, स्वयं शिल्पकार वत्सर ने अभी अभी यह स्वीकार भी किया है कि शिल्प उसी ने ही रचा है। अत: शिल्प कोई भ्रम नहीं है।”
“मान लिया कि यह शिल्प वास्तविक है। तो यह शिल्प इस समय कहाँ है? उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।”
“इस समय यह चित्र सिक्किम की पहाड़ियों में स्थित येला की शिल्पशाला में विद्यमान है। उसे न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।”
“क्यों?”
“शिल्प पत्थर का बना है। उसे वहाँ से यहाँ लाना संभव नहीं।”
“तो क्या आप यह कहते हैं कि प्रमाण के बिना ही न्यायालय न्याय करे?”
“नहीं महाशय। एक उपाय है। आप स्वयं वहाँ जाकर शिल्प देख सकते हो, संतुष्ट हो सकते हो। पश्चात न्याय कर सकते हो।”
“अर्थात न्यायालय स्वयं चलकर प्रमाण के पास जाए? यह संभव नहीं है, महोदय। न्यायालय के पास इतना समय नहीं है। ऐसे प्रस्ताव रख कर आप न्यायालय को भटकाना चाहते हो?”
“क्षमा चाहूँगा महाशय।” कपिल मौन हो गया।
“क्या मैं कुछ प्रस्ताव रख सकती हूँ?” सोनिया ने अनुमति मांगी।
“अवश्य। किन्तु उस प्रस्ताव निराधार न हो इसका ध्यान रखना।”
“जी। हम येला से वीडिओ कॉल पर बात कर सकते हैं। वह हमें शिल्प तक ले जाएगी।”
“यह व्यवहारू बात है। येला से बात करवाओ।”