रोहन ने उस दिन पहली बार घर का दरवाज़ा बहुत धीरे खोला था।
जैसे अंदर कोई सो रहा हो।
जैसे हल्की आवाज़ भी किसी को जगा देगी।
जैसे अब भी इस घर में रिया की सांसें बची हों।
लेकिन घर बहुत चुप था।
वही चुप्पी, जो किसी के जाने के बाद दीवारों पर चिपक जाती है।
वही चुप्पी, जो हर सुबह, हर शाम, हर कोने में अपना नाम लिख देती है।
रोहन ने जूते उतारे।
बैग कुर्सी पर फेंका।
और बिना कुछ बोले सीधे उस कमरे में चला गया, जहाँ रिया की चीज़ें वैसे ही रखी थीं, जैसे वो बस अभी वापस आने वाली हो।
कमरे की मेज़ पर उसकी डायरी पड़ी थी।
गुलाबी कवर वाली, किनारे से थोड़ी फटी हुई, और बीच में उसी की लिखावट में एक छोटा सा टैग चिपका था।
“मुझसे झगड़ा करने के बाद पढ़ना।”
रोहन के होंठ हल्के से काँपे।
वो बैठ गया।
डायरी को हाथ में लिया।
और फिर जैसे बहुत दिनों बाद कोई पुरानी सांस वापस ली हो, उसने पहला पन्ना खोला।
रिया को लिखना बहुत पसंद था।
वो छोटी छोटी बातों को भी ऐसे लिखती थी जैसे वे दुनिया की सबसे बड़ी बातें हों।
कभी दूध में चीनी कम पड़ गई।
कभी बस में धक्का लग गया।
कभी ऑफिस में बॉस ने मुस्कुरा कर “गुड जॉब” कहा।
कभी बारिश में भीगकर चाय पी।
कभी रोहन ने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “तुम बहुत ज़िद्दी हो।”
और वो लिखती, “हाँ, लेकिन तुम्हारे सामने कम।”
रोहन को ये सब याद था।
बहुत साफ़।
वो दोनों आठ साल पहले मिले थे।
एक मेट्रो स्टेशन पर।
रिया का फोन गिर गया था, स्क्रीन टूटी थी, और वो गुस्से में किसी से बहस कर रही थी।
रोहन ने बस इतना कहा था, “आपका फोन दिया जा सकता है, लेकिन आपकी लड़ाई में मैं नहीं पड़ना चाहता।”
वो पलटकर देखती है।
उसे घूरती है।
फिर हँस देती है।
वहीं से शुरुआत हुई थी।
बहुत साधारण।
बहुत असली।
बिलकुल फिल्मी नहीं।
और शायद इसी वजह से वो प्यार इतना गहरा था।
क्योंकि उसमें दिखावा नहीं था।
कोई बड़ा वादा नहीं था।
कोई चमकदार सपना नहीं था।
बस रोज़ की जिंदगी थी।
साथ में चाय।
टूटे हुए जूते।
बारिश में भीगी शर्ट।
रात के दो बजे बेमतलब की बातें।
और एक ऐसा भरोसा, जो धीरे धीरे रगों में उतर जाता है।
रोहन ने अगला पन्ना पलटा।
“आज रोहन बहुत थका हुआ था। मैंने उसके लिए खाना गर्म किया। वो बोला कि ज़रूरत नहीं थी। लेकिन फिर भी पूरा खा गया। झूठ बोलता है। मेरे हाथ का खाना उसे पसंद है।”
रोहन ने हल्की हँसी छोड़ी।
फिर अचानक उसकी आँखें भर आईं।
“पागल लड़की,” उसने धीमे से कहा।
कमरे में कोई जवाब नहीं था।
बस पंखे की आवाज़।
और घड़ी की टिक टिक।
उसने डायरी पढ़नी शुरू की।
एक पन्ना।
दो पन्ने।
तीन पन्ने।
धीरे धीरे उसे लगा जैसे रिया फिर उसके सामने बैठी हो।
वही बाल पीछे से बांधे हुए।
वही सफेद कुर्ता।
वही चाय के कप के साथ खींची हुई टाँगें।
वही आँखें, जिनमें हमेशा कुछ छुपा रहता था।
फिर भी, पिछले कुछ महीनों में वो थोड़ी अलग हो गई थी।
कम बोलती थी।
अचानक फोन छुपाने लगी थी।
कभी कभी रोहन की तरफ देखती तो उसकी नज़र कुछ पल के लिए हट जाती।
रोहन ने तब सोचा था कि शायद काम का तनाव है।
या मौसम का असर है।
या कोई और छोटी मोटी बात।
उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी वजह से रिया इतनी अंदर तक टूट रही होगी।
डायरी के बीच में एक पन्ना मोड़ा हुआ था।
रोहन ने उसे खोला।
और वहीं सब रुक गया।
“आज मैंने बहुत कोशिश की कि रोहन को सच बता दूँ। लेकिन आवाज़ गले में अटक गई। मैं उससे झूठ नहीं बोलना चाहती, पर सच बोलना उससे ज़्यादा मुश्किल लग रहा है।”
रोहन की साँस अटक गई।
उसने अगली लाइन पढ़ी।
“मैं किसी और से प्यार करने लगी हूँ।”
उसकी उंगलियों ने डायरी को जोर से पकड़ लिया।
जैसे अगर वो किताब नहीं, कोई चीज़ दबा ले तो सच बदल जाएगा।
“नहीं,” उसने बहुत धीमे कहा।
“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।”
उसने पन्ना आगे बढ़ाया।
“मैं उसे नहीं चाहती थी। या शायद चाहने लगी थी, और खुद से लड़ रही थी। मुझे नहीं पता। मुझे बस इतना पता है कि मैं रोहन को दुख नहीं देना चाहती।”
रोहन की आँखें सूख गईं।
अंदर कुछ ऐसा टूट गया, जिसे टूटना भी ठीक से नहीं कह सकते।
वो फिर पढ़ता रहा।
“रोहन बहुत अच्छा इंसान है। कभी कभी मुझे लगता है कि मैं उसके लायक नहीं हूँ। वो मेरे लिए किसी भी हद तक जा सकता है। और इसी बात से मुझे डर लगता है।”
रोहन हँसा।
बहुत अजीब हँसी।
जैसे इंसान हँसना भूल जाए, फिर भी आदत से हँस दे।
“तो ये था,” उसने बुदबुदाया।
“इतने दिनों से यही था।”
कमरे की दीवारें जैसे उसके आसपास खिसक आईं।
उसने खुद को सीट पर टिकाया।
और बाकी पन्ने पलटने लगा।
“आज ऑफिस के बाद मैंने अर्जुन से मुलाकात की। बस कुछ देर। उसने कहा कि वो मुझे समझता है। मुझे बहुत गुस्सा आया, क्योंकि मैं जानती थी कि मैं उससे जितना दूर रहना चाहूँ, उतना ही नहीं रह पा रही हूँ।”
रोहन ने डायरी बंद कर दी।
अर्जुन।
नाम उसने पहली बार वहीं पढ़ा था।
और उसी पल उसके दिमाग में बहुत सारी पुरानी बातें एक साथ चमक उठीं।
पिछले दो महीनों में रिया का फोन।
उसके देर से घर लौटने के बहाने।
उसका अचानक चुप हो जाना।
और एक बार जब रोहन ने उससे पूछा था, “सब ठीक है ना,” तो उसने मुस्कुरा कर कहा था, “हाँ, बस थक गई हूँ।”
रोहन को अब वह मुस्कान याद आ रही थी।
वो झूठी नहीं थी।
बस भारी थी।
उसके हाथ कांपने लगे।
उसने आखिरी पन्ने की तरफ देखा, लेकिन पढ़ने की हिम्मत नहीं हुई।
इसी बीच दरवाज़े की घंटी बजी।
रोहन चौंक गया।
वो उठकर बाहर आया।
दरवाज़ा खोला।
सामने रिया की बहन थी।
आँखें लाल।
सांस तेज़।
“भैया,” उसने घबराई हुई आवाज़ में कहा, “आपके पास रिया की डायरी है?”
रोहन ने उसे देखा।
फिर धीमे से सिर हिलाया।
“क्यों?”
वो कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, “क्योंकि रिया ने मरने से पहले मुझे एक बात बताई थी। और मैं अब तक हिम्मत नहीं कर पा रही थी।”
रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“क्या?”
बहन ने नीचे देखा।
“अर्जुन उसके किसी और से प्यार में होने की वजह नहीं था।”
रोहन ने एक कदम पीछे लिया।
“फिर क्या था?”
उसकी बहन की आवाज़ टूट गई।
“अर्जुन उसका पुराना दोस्त था। बहुत पुराना। कॉलेज के समय का। रिया उसके लिए कुछ महीनों से काम कर रही थी। एक छोटे प्रोजेक्ट में। उसे लगा था कि शायद उससे बात करके वो उलझन समझ जाएगी। लेकिन सच ये था कि रिया किसी और को नहीं, खुद को खो रही थी।”
रोहन चुप रहा।
बहन ने आगे कहा, “उसने डायरी में जो लिखा है, वो पूरा सच नहीं है। वो बस आपको बचाना चाहती थी।”
रोहन की आँखें उठीं।
“मुझे बचाना?”
“हाँ।”
बहन ने एक लंबी साँस ली।
“उस दिन अस्पताल में जब उसे पता चला कि उसका इलाज मुश्किल है, तब उसने फैसला कर लिया था कि वो आपको वो बोझ नहीं देगी।”
रोहन का पूरा शरीर जैसे सुन्न हो गया।
“क्या इलाज?”
बहन की आँखों में आँसू आ गए।
“उसे ब्रेन ट्यूमर था। आख़िरी स्टेज।”
रोहन ने अपना हाथ दीवार पर टिकाया।
उसे लगा वो गिर जाएगा।
कमरे की हवा कम हो गई।
दिल की धड़कन बहुत दूर से आ रही थी।
“नहीं…”
उसके मुंह से बस इतना निकला।
“उसने आपको इसलिए वो झूठ लिखा,” बहन ने कहा, “ताकि आप उसे छोड़ सकें। ताकि आप उससे नफरत कर सकें। ताकि आप उसकी बीमारी के साथ खुद को न तोड़ें।”
रोहन ने डायरी को देखा।
अब उसके शब्द किसी गद्दार की तरह नहीं लग रहे थे।
किसी घायल इंसान की तरह लग रहे थे।
एक ऐसा इंसान, जिसने प्यार को बचाने के लिए खुद को बुरा साबित कर दिया।
उसने आखिरी पन्ना खोला।
“अगर रोहन ये पढ़ रहा है, तो शायद मैं अब नहीं हूँ। मुझे माफ़ करना। मैंने तुम्हें झूठ बताया क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम मुझे याद रखो, दया से नहीं, प्यार से। मैं चाहती थी कि तुम आगे बढ़ो। मैं चाहती थी कि तुम टूटी हुई कहानी नहीं, अपनी ज़िंदगी जियो। और हाँ, मैंने किसी और को नहीं चाहा। बस एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि मैं तुम्हें खोने से बेहतर है कि तुम मुझे खो दो। यह मेरा सबसे बड़ा झूठ था। और सबसे बड़ा प्यार भी।”
रोहन की आँखों से आँसू गिरने लगे।
एक के बाद एक।
बिना रुके।
उसने डायरी छाती से लगा ली।
जैसे अब भी उसमें रिया की गर्मी बची हो।
बहन चुपचाप खड़ी रही।
फिर धीरे से बोली, “उसने जाने से पहले बस एक बात कही थी।”
रोहन ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“उसने कहा था, रोहन को बताना कि मैंने उसे छोड़ा नहीं था। मैंने सिर्फ़ उसे दर्द से बचाने की कोशिश की थी।”
कमरे में लंबी चुप्पी छा गई।
काफी देर बाद रोहन खिड़की के पास गया।
बाहर शाम उतर रही थी।
सड़क पर लोग भाग रहे थे।
ऑटो की आवाज़ आ रही थी।
किसी के घर से खाना बनने की खुशबू आ रही थी।
जिंदगी अभी भी चल रही थी।
और रिया अब नहीं थी।
लेकिन पहली बार रोहन को लगा कि शायद प्यार खत्म नहीं हुआ।
बस उसका रूप बदल गया है।
वो अब पकड़ने वाली चीज़ नहीं थी।
वो अब याद रहने वाली चीज़ थी।
वो अब किसी को बचाने वाली चुप्पी थी।
किसी अधूरे वाक्य में बचा हुआ सच थी।
किसी डायरी के पन्ने में बंद एक थरथराती हुई सांस थी।
उसने बहुत धीरे से कहा, “तुमने मुझे छोड़ा नहीं था, रिया।”
आवाज़ नहीं आई।
जवाब भी नहीं।
लेकिन उसके भीतर कहीं एक हल्की सी गर्मी लौट आई।
बहुत छोटी।
बहुत नाज़ुक।
जैसे कोई बुझती लौ आख़िरी बार काँप कर फिर जल उठे।
उसने डायरी बंद की।
और पहली बार उसे अलमारी में नहीं, अपने पास रख लिया।
क्योंकि अब उसे समझ आ गया था।
कभी कभी इंसान जिस प्यार को खोता हुआ समझता है, असल में वही प्यार उसे संभाल रहा होता है।
बस बहुत चुपचाप।
बहुत दर्द के साथ।
और बहुत देर तक।
रोहन ने खिड़की से बाहर देखा।
फिर धीमे से कहा, “तुम चली गईं… लेकिन तुम्हारा सच अभी भी मेरे साथ है।”
और उस शाम, टूटे हुए दिल के साथ भी, वो पहली बार रो नहीं रहा था।
वो जीने की कोशिश कर रहा था।
क्योंकि तुम्हारे बिना भी तुम, कभी कभी सबसे ज्यादा साथ होते हो।