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आदमी ___________ आदमी को सचमुच आदमी होने के लिए होना पड़ेगा सबसे पहले एक औरत। उसे उतरना होगा नीचे, झाँकना होगा भीतर, जीनी होगी करुणा, बनना होगा नदी जो अपने आलिंगन में पर्वतों को सहलाती है। उसे छोड़ना पड़ेगा "मैं" का गर्भ और होना पड़ेगा प्रेमी से इतर प्रेम। एक आदमी जब तक नहीं सीखता अपने शरीर से ज़्यादा अपनी संवेदना में रहना, जब तक नहीं समझता ‘नहीं’ का अर्थ ‘नहीं’ और जीतने से अधिक हारना। तब तक वह कुछ गुणसूत्रों वाला केवल नर है, आदमी नहीं। क्योंकि आदमी की खोज और उसकी तकमील उसके भीतर की एक औरत है। @ कुणाल कुमार
लकड़बग्घा ______________ कविता से इतर, कवि से इतर, यहाँ तक कि खुद से भी इतर, मैंने देखा। तो देखा ये कि शहर में लकड़बग्घे आदमी की शक्ल में घूम रहे हैं। उनके बदन पर इस्त्री किए हुए कपड़े हैं, जेब में संविधान है, होठों पर संस्कृति, और आँखों में दो जोड़ी मांस की भूख। वे कविताएँ कह रहे हैं, वे ईश्वर बचा रहे हैं, वे क़ानून बना रहे, और नैतिकता पर लंबे भाषण दे रहे हैं। दिन में उनके जबड़े सामान्य दिख रहे, मगर रात होते ही उनके दाँत भाषा से बाहर आ रहे। उनकी हँसी कमरों से टकरा रही, और उनका ईमान जेबों से गिर रहा। मैंने देखा— किसान की आँखों में उनके लिए ख़ौफ़, स्त्री की पीठ पर पंजों के निशान, और सख़्त पड़ चुकी बच्चों की लाशें। और यह सब देखते हुए मैंने तोड़ लिए अपने दाँत, काट लिए अपने तालू, मगर फिर भी आईने में एक लकड़बग्घा हँस रहा। @ कुणाल कुमार
तुम्हारी आँख ____________________ उस युग में, जहाँ सब कुछ लिखा जा चुका, सब कुछ कहा जा चुका, और लगभग-लगभग सब कुछ खोजा जा चुका है, उस युग में मुझे कुछ भी नहीं होना, तुम्हारी एक आँख से इतर। ताकि देख सकूँ वे नाम जो अभिलेखों तक कभी पहुँचे ही नहीं, वे चेहरे जो इतिहास में नहीं, वे स्त्रियाँ जो लौटीं, वे जंगल जो काट दिए गए, और वो प्रेम जो जिए गए। मुझे सब देखना है ताकि दर्ज हो सके तथाकथित कवियों की, तथाकथित इतिहासकारों की, तथाकथित खोजकर्ताओं की सबसे पुरानी और सबसे सफल असफलता। @ कुणाल कुमार
लौटी हुई स्त्रियाँ ________________ इस समाज में जितना सरल समझा गया जाना, उससे कहीं अधिक संदिग्ध और दोहरे अर्थों से भरा रहा लौट आना। राम लौटे तो नगर सजाया गया, दीये जलाए गए, देहरियों ने आँचल से अपना माथा पोंछा और कहा स्वागत है। सिद्धार्थ लौटे तो उन्हें बुद्ध कहा गया, उनकी चुप्पियों को उपदेश बना दिया गया, और उनके लौटने को धर्म। मगर जब सीता लौटीं तो उनके हिस्से आग आई। और फूलन लौटीं तो उनके हिस्से गोलियाँ। मैंने इतिहास पलटकर देखा और पाया कि यह सभ्यता लौटे हुए पुरुषों से तो प्रेरणा लेती है, मगर लौटी हुई स्त्रियों से आँख चुराती है। तथाकथित पुरुष समाज नयन-नक्श और काजल से भरी आँखों पर मर मिटता है, उन पर कविताएँ लिखता है। क्योंकि वो आँखें है देखी जा सकने वाली। मगर वो असुविधाजनक हो जाते है सवाल करती हुई स्त्रियों पे क्योंकि वो आँखें लौटकर देखती हैं। शायद इसलिए हम आज भी लौटे हुए राम पर त्योहार मनाते हैं, और लौटी हुई फूलन पर गालियाँ। @ कुणाल कुमार
मैं से तुम ___________________ लिखने के क्रम में जब-जब उच्चारा है तुम्हारा नाम / देखा है तुम्हें वैसे जैसे देखती हैं प्रेम से लबालब आँखें। तो, मेरे होठों की त्रिज्या में खिल आए हैं गुलदाऊदी के फूल। फूल जिनके पंखुड़ियों पर ठहर गया — मेरा पूरा “मैं” ठहर गया सारा दर्शन, ठहर गया है कवि-मन भी। और इस तरह तुम्हें लिखते-लिखते मैं उतर आया हूँ नम्रता में, प्रेम में, विश्वास में, और मनुष्य होने के हिस्से में। इसलिए प्रिय, यदि कभी मेरे होठों से कोई फूल झरे, तो समझना — मैं “तुम” हो चुका हूँ। और “मैं” से “तुम” हो जाना प्रेम की सबसे परिपक्व, सबसे सुंदरतम घटना है। @ कुणाल कुमार
निर्वासित देवता _________________' सड़क के उस पार से रोज़ एक माँग उठती थी, धीमी पर लगातार, जैसे भूख भाषा सीख रही हो। मैं जानता था यह कोई भ्रम नहीं, यह ज़रूरत है। फिर भी मैंने आँखें मूँद लीं, तालू काट लिए और उसे डर, अँधेरा, षड्यंत्र कहकर आगे बढ़ गया। मैं कायर नहीं था होता तो शायद रुक भी जाता पर मैं सुविधाजनक था। और सुविधाजनक होना एक भ्रामक मोतियाबिंद है काला मोतियाबिंद, जिसमें लोग खो देते हैं अपनी संपूर्ण दृष्टि। और इस तरह किसी और की नोची गई आँखें मेरे अँधेपन से कम महत्त्वपूर्ण लगने लगीं। वैसे सड़क के उस पार जाता तो ज़िम्मेदारी दिखती। और ज़िम्मेदारी से मैं हमेशा बहुत सभ्य तरीक़ों से बचता आया हूँ। अब उस तरफ़ से कुछ नहीं उठता न कोई माँग, न कोई चीख, सिवाय एक सड़ी-गली टीस के। टीस, जिसमें दर्ज है उस दिन की उम्मीद— मेरे आने की, बचा लेने की। ख़ैर, वह मर चुकी है, और उसके बदले वह एक गंध हो गई । एक ऐसी गंध जो कसाईखानों में, वैश्याओं के मोहल्लों में सामान्य हो जाती है। यह गंध पाप की नहीं, उपेक्षा की है और उपेक्षा मेरे द्वारा की गई सबसे घिनोना कृत है । शायद इसलिए मैं हुआ सबकुछ भाई , दोस्त , प्रेमी , पुत्र लेकिन अंदर से रहा केवल एक निर्वासित देवता ।
अ से _______________ मेरे घर से थोड़ी दूर एक कुआँ था जिसके पास सलीम मास्टर बैठा करते थे। वे पानी नहीं, बोलना सिखाते थे। पहले दिन उन्होंने ‘अ’ लिखा और कहा — “अ से आदमी।” फिर मुस्कुराकर जोड़ा — “आदमी से पहले इंसान।” हम हँसते थे। हमें फर्क समझ नहीं आता था। उनकी जेब में हमेशा चॉक का आधा टुकड़ा रहता, और आँखों में पूरा विश्वास। एक दोपहर गली में शोर आया। ढोल, झंडे, और आवाज़ें जो अपने ही प्रतिध्वनि से बड़ी हो चुकी थीं। वे लोग आए जिन्हें अक्षरों से ज़्यादा पहचान की चिंता थी। उन्होंने पूछा — “तुम क्या सिखाते हो?” मास्टर ने कहा — “बस बोलना।” उन्होंने कहा — “तो बोलो।” मास्टर ने होंठ खोले, पर शब्द चुनने लगे। जैसे कोई पिता अपने बच्चों में से किसे बचाए यह सोचता है। उन्होंने ‘अ’ कहना चाहा, पर भीड़ ने ‘अल्लाह’ सुन लिया। उन्होंने ‘इ’ कहना चाहा, पर भीड़ ने ‘इंक़लाब’ सुन लिया। उन्होंने ‘म’ कहना चाहा, पर भीड़ को सिर्फ़ मज़हब सुनाई दिया। फिर चॉक उनके हाथ से गिरा, और जमीन पर टूट गया दो बराबर हिस्सों में जैसे भाषा बँट गई हो। उस शाम कुएँ का पानी खारा लगा। और अगले दिन दीवार पर लिखा था — “यहाँ सिर्फ़ एक शब्द चलेगा" "र से राम"। अब कुआँ सूखा है। और दीवार पर सिर्फ़ धूल बची है। पर कभी-कभी बारिश में मिट्टी से फिर उभर आता है ‘अ’ "अ से आदमी पर पहले इंसान"। @ कुणाल कुमार
हस्तमैथुन _____________________ सभ्यताएँ उन इच्छाओं से डरती आई हैं जो अकेले में पूरी हो जाती हैं, क्योंकि उन्हें बाज़ार नहीं चाहिए, संस्था नहीं चाहिए, ईश्वर भी नहीं चाहिए। ऐसी इच्छाओं में मनुष्य न उपभोक्ता होता है न भक्त, न पति और न कोई पुत्र उस वक़्त वो देह और अपने होने के अधिकार के सिवा कुछ नहीं होता । शायद इसलिए हस्थमैथुन को छिपाना सिखाया गया, शर्म से ढक दिया गया, और अराजक तत्त्व कह कर गलत ठहरा दिया गया। क्योंकि अपने होने के अधिकार से एक सहज स्वतंत्रता का अभिप्राय है और स्वतंत्रता हमेशा सबसे पहले अनैतिक घोषित की जाती है।
मुस्कुराहट _____________ कुछ आकृतियाँ इरादे से बनती हैं, कुछ भूख से, कुछ अभ्यास से। और कुछ बिना सिद्ध किए अचानक घट जाती हैं। तुम्हारी मुस्कान उसी श्रेणी में आती है। जब तुम मुस्कुराती हो तो होठों के बीच बहुत कुछ ठहरता है— और उस ठहराव में संरचना बनती भी है और बिगड़ती भी। हुसैन होता तो इसे निर्भीक कहकर रह जाता, रविदास प्रेम कहकर उसे मनुष्यता में लौटा देता। और पिकासो अप्रत्याशित घटना कहकर खुद को बचा लेता। खैर, इन सभी से इतर मैं कहूँगा इसे सबसे सुंदर संग्रहालय, जहाँ चित्र स्वेच्छा से उभरते, जीते और साँस लेते हैं। शायद इसलिए मैं घंटों पेंसिल चलाकर भी नहीं बना पाया वो चित्र जो तुम सिर्फ़ हँसकर बना गई। @ कुणाल कुमार
जंगली फूल ___________________ पुरुष जब अपने से आगे चलती चीज़ों से डरा तो डर में उसने न रोना चुना, न काँपना, न कोई कंधा बल्कि उसने मरा जाना चुना। लेकिन मरने से पहले बहुत पहले एक काम किया— उसने नियम बनाया। नियम से , परिभाषा निकली। परिभाषा से केंद्र। केंद्र पर वह रहा बाक़ी घूमते रहे लोग किसी ग्रह की तरह । और यहीं से व्यवस्था शुरु हुई। जो पास थे वे पवित्र हुए जो दूर थे वे बाग़ी। स्त्री दोनों में नहीं थी वह पहले असुविधा बनी, फिर सवाल। और जब सवाल टिके रहे— तो उन्हें क्रांति कहा गया। शायद इसलिए मैं जब तुम्हें देखता हूँ— तो मेरा पुरुष होना काम नहीं आता। और धीरे धीरे केंद्र से उतर कर मैं स्त्री हो जाता हू। स्त्री जो उल्ट है डर के जो उल्ट है ईर्ष्या के जो उल्ट है असहिष्णुता के। और इस तरह तुम्हें देखते हुए मुझमें बची रह जाती है "संभावना"। संभावना पर्वत , पहाड़ और केंद्र से इतर जंगली फूल होने की । @ कुणाल कुमार
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