आदमी
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आदमी को
सचमुच आदमी होने के लिए
होना पड़ेगा सबसे पहले
एक औरत।
उसे उतरना होगा नीचे,
झाँकना होगा भीतर,
जीनी होगी करुणा,
बनना होगा नदी
जो अपने आलिंगन में
पर्वतों को सहलाती है।
उसे छोड़ना पड़ेगा
"मैं" का गर्भ और होना पड़ेगा
प्रेमी से इतर प्रेम।
एक आदमी
जब तक नहीं सीखता
अपने शरीर से ज़्यादा
अपनी संवेदना में रहना,
जब तक नहीं समझता
‘नहीं’ का अर्थ ‘नहीं’
और जीतने से अधिक हारना।
तब तक
वह कुछ गुणसूत्रों वाला
केवल नर है,
आदमी नहीं।
क्योंकि आदमी की खोज
और उसकी तकमील
उसके भीतर की
एक औरत है।
@ कुणाल कुमार