अ से
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मेरे घर से थोड़ी दूर
एक कुआँ था
जिसके पास
सलीम मास्टर बैठा करते थे।
वे पानी नहीं,
बोलना सिखाते थे।
पहले दिन
उन्होंने ‘अ’ लिखा
और कहा —
“अ से आदमी।”
फिर मुस्कुराकर जोड़ा —
“आदमी से पहले इंसान।”
हम हँसते थे।
हमें फर्क समझ नहीं आता था।
उनकी जेब में हमेशा
चॉक का आधा टुकड़ा रहता,
और आँखों में पूरा विश्वास।
एक दोपहर
गली में शोर आया।
ढोल, झंडे,
और आवाज़ें
जो अपने ही प्रतिध्वनि से बड़ी हो चुकी थीं।
वे लोग आए
जिन्हें अक्षरों से ज़्यादा
पहचान की चिंता थी।
उन्होंने पूछा —
“तुम क्या सिखाते हो?”
मास्टर ने कहा —
“बस बोलना।”
उन्होंने कहा —
“तो बोलो।”
मास्टर ने होंठ खोले,
पर शब्द चुनने लगे।
जैसे कोई पिता
अपने बच्चों में से
किसे बचाए यह सोचता है।
उन्होंने ‘अ’ कहना चाहा,
पर भीड़ ने
‘अल्लाह’ सुन लिया।
उन्होंने ‘इ’ कहना चाहा,
पर भीड़ ने
‘इंक़लाब’ सुन लिया।
उन्होंने ‘म’ कहना चाहा,
पर भीड़ को
सिर्फ़ मज़हब सुनाई दिया।
फिर
चॉक उनके हाथ से गिरा,
और जमीन पर टूट गया
दो बराबर हिस्सों में
जैसे भाषा बँट गई हो।
उस शाम
कुएँ का पानी खारा लगा।
और अगले दिन
दीवार पर लिखा था —
“यहाँ सिर्फ़ एक शब्द चलेगा"
"र से राम"।
अब
कुआँ सूखा है।
और दीवार पर
सिर्फ़ धूल बची है।
पर कभी-कभी
बारिश में
मिट्टी से फिर उभर आता है
‘अ’
"अ से आदमी पर पहले इंसान"।
@ कुणाल कुमार