Hindi Quote in Poem by kunal kumar

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लकड़बग्घा
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कविता से इतर,
कवि से इतर,
यहाँ तक कि
खुद से भी इतर,
मैंने देखा।

तो देखा ये कि
शहर में
लकड़बग्घे
आदमी की शक्ल में
घूम रहे हैं।

उनके बदन पर
इस्त्री किए हुए कपड़े हैं,
जेब में संविधान है,
होठों पर संस्कृति,
और आँखों में
दो जोड़ी मांस की भूख।

वे कविताएँ कह रहे हैं,
वे ईश्वर बचा रहे हैं,
वे क़ानून बना रहे,
और नैतिकता पर
लंबे भाषण दे रहे हैं।

दिन में
उनके जबड़े
सामान्य दिख रहे,
मगर रात होते ही
उनके दाँत
भाषा से बाहर आ रहे।

उनकी हँसी
कमरों से टकरा रही,
और उनका ईमान
जेबों से गिर रहा।

मैंने देखा—
किसान की आँखों में
उनके लिए ख़ौफ़,
स्त्री की पीठ पर
पंजों के निशान,
और सख़्त पड़ चुकी
बच्चों की लाशें।

और यह सब देखते हुए
मैंने
तोड़ लिए अपने दाँत,
काट लिए अपने तालू,
मगर फिर भी
आईने में
एक लकड़बग्घा
हँस रहा।
@ कुणाल कुमार

Hindi Poem by kunal kumar : 112024010
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