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vyomatara

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@cosmicstar

प्रेम और प्रतिशोध
​यह सृष्टि एक कहानी है पुरानी,
जहाँ पे प्यार और नफ़रत का मेला।
कभी है मोम सी चाहत दीवानी,
कभी प्रतिशोध का चलता है खेला।
​जहाँ ज़हरीले काँटे उग रहे हैं,
वहीं पर फूल भी कलियाँ खिलाता।
दिलों में घाव जो गहरे रहे हैं,
उन्हें फिर वक़्त का मरहम सुहाता।
​न मिटती है मोहब्बत इस जहाँ से,
न नफ़रत का कभी अंत होता,
उलझती ज़िन्दगी हर एक यहाँ से,
कोई हँसता यहाँ, कोई है रोता।
​इसी ताने-बाने में जग है चलता,
जहाँ हर रोज़ नया सूरज निकलता।

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subh ratri sabhi ko
- vyomatara

​मित्रता का मुखौटा पहनकर, मैं सहज और दयालु बना रहा,
और अपने सीने में सुलगते सितारों को छुपाए रखा;
मुझे जो शांत भूमिका मिली थी, मैं उसे निभाता रहा,
जबकि मेरी अंतरात्मा की सारी गहरी इच्छाएँ दबी रहीं।
पर नदियाँ कभी जमे हुए पत्थर की नकल नहीं कर सकतीं,
और न ही भोर अपनी सुनहरी दस्तक को रोक सकती है;
बहुत लंबे समय तक मैंने इस पवित्र सत्य को छुपा कर रखा,
और अपनी आँखों की उस बेताब चाहत पर पर्दा डाले रखा।
​आज, मैं इस संभले हुए कवच को गिरा रहा हूँ,
ताकि अपने धड़कते दिल को तुम्हारे कदमों में रख सकूँ।
अब कोई छुपा हुआ अर्थ नहीं, कोई हिफाज़त की दीवार नहीं,
बस एक सच्चा सुर, जो इस गीत को मुकम्मल कर दे।
​मुझे तुमसे मोहब्बत है—वैसे नहीं जैसे साए रात से करते हैं,
बल्कि वैसे, जैसे जागती हुई ज़मीन नूर (रोशनी) की चाह करती है।

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mrityu ki abhilasha
थका चुकी है जिंदगी, अब मौन का अधिकार दे,
इस सुलगते दिल को मेरे, शून्य का उपहार दे।
सांस की बैरी कतारें, अब रुकी सी लगती हैं,
ख्वाब की सूखी जमीं पर, झुर्रियां ही दिखती हैं।
​देह के इस पिंजरे से, पंछी को आजाद कर,
शोर से घिरे शहर में, इक सुकूं आबाद कर।
जीत की चाहत नहीं, न हार का अब खौफ है,
मिट सके जो दर्द सारा, मौत का वो शौक है।
​रात की काली चदरिया, ओढ़ कर सो जाऊं मैं,
इस जहां के रास्तों से, दूर कहीं खो जाऊं मैं।
अब न कोई अश्क हो, न याद का कोई निशाँ,
थपकी देकर सुला दे, ओ धरा के आसमां।
​मिटा दे हस्ती मेरी, कि अब आराम हो,
खत्म ये बेनाम सदियों का, ढलती शाम हो।

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एक ही धारा के हैं ये दो अलग प्रवाह,
एक ही सीने की हलचल से होते हैं जवान;
एक संजोता है सपनों की खूबसूरत राह,
दूजा उजाड़ देता है दिल का ही आशियाना।
प्रेम आता है तो खुले हाथ साथ लाता है,
एक धीमा खिंचाव जो हमें पास खींचता है,
बंजर ज़मीन में भी वो उम्मीद उगाता है,
और धीमे से कहकर हर डर को जीतता है।
​पर ठीक पीछे इसके, एक साया भी पलता है,
जब नफ़रत उसी आग पर हक़ जताती है,
बर्फ़ के नीचे एक कड़वा सा कोहरा चलता है,
जो मरे हुए अरमानों की राख से जनम पाती है।
ये दोनों अलग रास्तों के मुसाफ़िर नहीं हैं,
ये एक ही तलवार की दो धार हैं, ज़हरीली और हसीं।

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