Hindi Quote in Poem by vyomatara

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mrityu ki abhilasha
थका चुकी है जिंदगी, अब मौन का अधिकार दे,
इस सुलगते दिल को मेरे, शून्य का उपहार दे।
सांस की बैरी कतारें, अब रुकी सी लगती हैं,
ख्वाब की सूखी जमीं पर, झुर्रियां ही दिखती हैं।
​देह के इस पिंजरे से, पंछी को आजाद कर,
शोर से घिरे शहर में, इक सुकूं आबाद कर।
जीत की चाहत नहीं, न हार का अब खौफ है,
मिट सके जो दर्द सारा, मौत का वो शौक है।
​रात की काली चदरिया, ओढ़ कर सो जाऊं मैं,
इस जहां के रास्तों से, दूर कहीं खो जाऊं मैं।
अब न कोई अश्क हो, न याद का कोई निशाँ,
थपकी देकर सुला दे, ओ धरा के आसमां।
​मिटा दे हस्ती मेरी, कि अब आराम हो,
खत्म ये बेनाम सदियों का, ढलती शाम हो।

Hindi Poem by vyomatara : 112027829
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