Hindi Quote in Poem by prachi Gurjar

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“पक्की मिट्टी….”

मैं सोचती हूँ
समाज को इतनी जल्दी क्यों रहती है
कच्ची उम्रों को ब्याह देने की

शायद इसलिए
क्योंकि कच्ची मिट्टी को आकार देना आसान होता है
उसे जिस साँचे में रखो
वह वैसी ही ढल जाती है
जिधर मोड़ो
उधर मुड़ जाती है

जिसे अपना आकाश भी नहीं मालूम
वह पिंजरे को ही दुनिया समझ लेती है

मैं सोचती हूँ
समाज को लड़कियों के बड़े होने से नहीं
उनके पक जाने से डर लगता है
क्योंकि धूप में पकी हुई मिट्टी
हर हाथ का कहा नहीं मानती

वह जानती है
कि उसे घड़ा बनना है
दीया बनना है
या फिर यूँ ही मिट्टी बने रहना है

कच्ची मिट्टी को
जल्दी जल्दी सौंप दिया जाता है
किसी और के हाथों में
ताकि वह पूछ न सके
मैं कौन हूँ
मुझे क्या बनना है
और मैं किस दिशा में बहना चाहती हूँ

क्योंकि सवाल करती हुई लड़कियाँ
समाज को कभी पसंद नहीं आईं
उसे तो हमेशा
वैसी मिट्टी चाहिए थी
जो चाक पर चढ़ते ही
अपनी इच्छा भूल जाए

लेकिन मैंने देखा है
कुछ मिट्टियाँ देर तक धूप में पड़ी रहती हैं
बारिशें सहती हैं
आँधियाँ सहती हैं
टूटती हैं
बिखरती हैं
फिर भी पकी रहती हैं

और फिर एक दिन
कोई कुम्हार उन्हें छूकर देखता है
तो समझ जाता है
अब यह मिट्टी
किसी साँचे में नहीं ढलेगी
अब इसका आकार
यह खुद चुनेगी

शायद इसी बात से
समाज सबसे ज्यादा डरता है
उसे देर से होने वाले विवाह से नहीं
अपने बारे में सोचने लगी स्त्री से डर लगता है

क्योंकि जिस दिन एक स्त्री
अपनी धूप में पक जाती है
उस दिन वह किसी की बनाई हुई मूर्ति नहीं रहती
वह अपनी ही रचना बन जाती है

प्राची गुर्जर….

Hindi Poem by prachi Gurjar : 112029843
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