“पत्थर की यात्रा”
एक दिन
रास्ते पर मेरा पाँव एक पत्थर से टकराया।
मैंने देखा नहीं।
बस ठोकर मार दी।
एक बार, फिर बार-बार।
और वह मेरे साथ चलता रहा।
मुझे लगा मैं खेल रही हूँ।
शायद उसे भी यही लगा।
जब मेरी मंज़िल आ गई,
मैं भीतर चली गई।
वह वहीं छूट गया
धूल में, खरोंचों से भरा।
उस पर मेरे पैरों के निशान थे।
और दुनिया की मिट्टी।
फिर कोई और आया।
फिर कोई और ठोकर।
फिर कोई और सफ़र।
शायद कुछ पत्थरों की तक़दीर में
चलना नहीं लिखा होता।
सिर्फ घिसटना लिखा होता है।
पर हर रास्ता एक-सा नहीं होता।
एक दिन एक ज़ोर की ठोकर ने
उसे सड़क से उठाकर नदी में फेंक दिया।
वह डर गया।
वह तो रास्ते का था, पानी का नहीं।
नदी ने कुछ नहीं पूछा।
बस बहती रही।
और उसकी देह से धूल धोती रही।
सालों की खरोंचों में
ठंडा पानी भरती रही।
वहाँ उसे अपने जैसे और पत्थर मिले।
कोई पहाड़ से टूटा था,
कोई मंदिर से।
सबके पास अपनी टूटन थी।
इसलिए किसी ने किसी का दर्द नहीं पूछा।
वक़्त बहता रहा।
नदी बहती रही।
वह भी बहता रहा।
और एक दिन
जब उसने पहली बार समुद्र देखा,
तो भूल गया कि कभी वह
किसी की ठोकर था।
अब वह धूल से खाली था।
खरोंचों से मुक्त था।
शांत था।
चमकता हुआ।
अपनी ख़ामोशी में पूरा।
तब समझ आया
हम भी पत्थरों जैसे होते हैं।
कुछ लोग हमें रास्ते में
ठोकर समझकर साथ रखते हैं।
और मंज़िल आते ही छोड़ जाते हैं।
उस वक़्त लगता है यही अंत है।
पर अक्सर…
वहीं से नदी शुरू होती है।
जो रास्तों पर छूट जाते हैं,
वही एक दिन
समुद्र तक पहुँचकर
मोती नहीं बनते,
पर अपनी चमक ज़रूर पा लेते हैं।
प्राची गुर्जर…..