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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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दोहा - श्री जी कनक प्रभा

कला जन्म से थी हुईं, जीवन की मुस्कान।
कनक प्रभा हो पथ चली, शासन माता जान।।

सूरजमल जिनके पिता, छोटी बाई मातु।
कनक बन गई एक दिन,सोना जैसी धातु।।

श्री तुलसी ने कला को, दिया नया था नाम।
कनक प्रभा की कीर्ति से, फैला नव पैगाम।।

तेरा पंथी साधिका, तुलसी दीक्षा पाय।
साध्वी प्रमुखा रूप में, पद को किया सुभाय।।

कनक प्रभा जी साधिका, बहुगुण की थीं खान।
जैन, भिक्षुणी, लेखिका, सन्यासी सम्मान।।

कनक प्रभा जी का हुआ, अमर जगत में नाम।
बिना मोह माया किया, रखे भाव निष्काम ।।

तुलसी कृतियों का किया, सदा आपने गान।
तनिक नहीं था आप में, लोभ, मोह अभिमान।।

सकल जगत में आपका, बड़ा मान सम्मान।
चरण वंदना सब करें, कृपा आपकी जान।।

शासन माता को करूँ, नमन जोड़ कर हाथ।
सूक्ष्म रूप में ही सही, रहो हमारे साथ।।

महिलाओं को कनक ने, नई दिखाई राह।
उन्नति पथ पर ले बढ़ें, ये थी उनकी चाह।।

साध्वी जी ने गढ़ दिया, एक नया प्रतिमान।
विविध पदों पर काम कर, रहीं सदा गतिमान।।

शासन माता कनक ने, पाया कउत्तम स्थान।
इक्यासी की उम्र में, जीशवन का अवसान।।

धन्य-धन्य जीवन हुआ, यश गाथा उत्कर्ष।
जिनसे प्राणी सीखते, क्या होता है हर्ष।।

तेरापंथी साध्वी, ऊँचा तव स्थान।
तीस वर्ष में मिल गया, साध्वी प्रमुखा मान।।

कनक प्रभा जी आपको, शत-शत बार प्रणाम।
जैन धर्म को आपने, दिया नया आयाम।।

महरौली में आपका, हुआ देह का त्याग।
जैन धर्म के लोग सब, मानें इसे प्रयाग।।

दिव्या पर करिए कृपा, कनक प्रभा जी आप।
और निधी का संग में, हरो शोक संताप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा-कहें सुधीर कविराय ३५
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बुजुर्ग
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छाँव शीष जिनके रहे, इनकी शीतल छाँव।
उन पर चलता है नहीं, कभी किसी का दाँव।।

जो करता इनका सदा, मान और सम्मान।
ईश्वर की उस पर कृपा, दूर रहें अपमान।।

आया है कैसा समय, शर्म हया सब दूर।
मात-पिता बूढ़े हुए, हम मस्ती में चूर।।

वृद्ध जनों को मिल रहा, वृद्धा आश्रम ठौर।
अपनों में आने लगा, जब से स्वारथ बौर।।

अपने ही अब कोसते, अपनों को ही रोज।
जाने क्या हैं पा रहे, खाकर इनका भोज।।

कौन आज है आपका, शुभचिंतक सिरमौर।
मुश्किल में यदि हैं पड़े, कौन दे रहा ठौर।।
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वाणी
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वाणी बतलाती हमें, मानव का व्यवहार।
चाहे जितना हो बड़ा, उसका घर परिवार।।

कटु वाणी है छीनती, इक दूजे का चैन।
कहीं दुश्मनी हो रही, कहीं भीगते नैन।।

वाणी में क्या है रखा, नहीं समझते आप।
इसीलिए तो कर रहे, अंजाने में पाप।।

वाणी पर जिसने रखा, निज अंकुश भरपूर।
पास उसी के आ रहे, कल तक थे जो दूर।।

वाणी जिसकी मौन है, उससे डरिए आप।
नहीं छेड़ना भूल से, मिले बहुत संताप।।
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नववर्ष
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नया वर्ष छब्बीस का, लेकर आया हर्ष।
हर प्राणी खुशहाल हो, फैले नव उत्कर्ष।।

नये वर्ष में हम सभी, मिलकर करें विचार।
पावन रखना है हमें, उचित प्रेम व्यवहार।।

नये वर्ष में क्या नया, बड़ा प्रश्न है आज।
प्रेम प्यार व्यवहार सम, होगा सबका काज।।

नये वर्ष में दीजिए, मिलकर दुआ हजार।
खुशहाली से हो भरा, मम जीवन संसार।।

छोटों को आशीष है, चरण बड़ों के शीश।
नया वर्ष सबको सदा, देता शुभ आशीष॥

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गणतंत्र दिवस
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उत्सव है गणतंत्र का, हर्षित भारत देश।
संविधान गुण गा रहे, अद्भुत है परिवेश।।

लोकतंत्र सबसे बड़ा, सजा तिरंगा ताज।
सर्वधर्म समभाव का, भारत में है राज।।

संविधान का हम सभी, करते हैं गुणगान।
और तिरंगा दे रहा, हमको निज पहचान।।

आज देख कर्तव्य पथ, भारत का उत्कर्ष।
दुश्मन सब बेचैन हैं, शुभचिंतक में हर्ष।।

दुनिया ने जब से सुनी, महामहिम की बात।
दुश्मन सब बेचैन हैं, डर-डर काटें रात।।

संविधान की आड़ में, होते कितने खेल।
लोकतंत्र के नाम पर, भाग रही है रेल।।

अजर-अमर गणतंत्र को, दुनिया देती मान।
भारत का गौरव बढ़े, यही हमारी शान।।
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हिंदी
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हिंदी का गौरव बढ़े, ऐसा करिए काम।
नाहक में ही आप सब, होते क्यों बदनाम।।

हिंदी हमसे पूछती, बतलाओ तो आज।
कह सुधीर कैसे बनूँ, भाषा का सरताज।।
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यमराज
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भटक गये यमराज जी, जाने कैसे राह।
या जागी कुछ है नई, उनके मन में चाह।।

मुझ पर कोई अब नहीं, देता थोड़ा ध्यान।
इसीलिए यमराज जी, बाँट रहे गुरु ज्ञान।।

लगता जैसे सो गया, आज मित्र यमराज।
इसीलिए क्या थम गया, मेरा सारा काज।।

काम बहुत ही शेष है, समय छूटता हाथ। अब केवल यमराज ही, दे सकता है साथ।।

मंजिल अपनी आ गई, अब तो यारों पास।
आप सभी को है पता, यम अपने हैं खास।।
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विविध
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नाहक मन में है भरा, इतना अधिक गुबार।
या फिर केवल चाहते, ठनी रहे ये रार।।

मन का मैल निकालिए, यही समय की माँग।
या फिर तोड़ें आपकी, हम सब मिलकर टाँग।।

भलमानुष इतना नहीं, बनकर रहिए आप।
कल पछताने से भला, नहीं करो ये पाप।।

कौन दे रहा आपको, भला आजकल भाव।
नाम एक बतलाइए, नहीं कुरेदे घाव।।

जन्मदिवस है अटल का, आज बहुत ही खास।
स्वामी अद्भुत गुणों के, संग हास परिहास।।

तुलसी पूजन खास है, सभी पूजिए आज।
श्रद्धा अरु विश्वास से, करते रहिए काज।।

ठंडी दुश्मन बन रही, राजा हो या रंक।
नाहक लेती स्वयं ही, अपने शीश कलंक।।

तीन दिवस प्रतिभाग कर, लौट गया से मित्र।
समझक्ष नहीं आता मुझे, खींचूँ कैसे चित्र।।

संचालक सब आलसी, या फिर कोई रोग।
या नाहक हैरान हूँ, सब हैं स्वस्थ निरोग।।

मायूसी को छोड़ दो, मत हो आप अधीर।
इससे तो अच्छा भला, बनकर रहो कबीर।।

समय बड़ा बलवान है, इसका रखिए ध्यान।
मूरख हो तुम क्या बड़े, गाते नीरस गान।।

कुछ बड़बोले लोग हैं, सदा बघारें ज्ञान।
नहीं समझते वे कभी, उनका अलग विधान।।

चाह रहे जो हम सभी, रहा न उसका अंत।
यही हमें समझा रहे, ज्ञानी मुनिजन संत।।

कहना मानोगे नहीं, बुद्धिमान हो आप।
बेवकूफ हम भी नहीं, नाहक करते जाप।।

मौन छोड़ कर आइए, सभी पटल के द्वार।
कम ज्यादा कुछ कीजिए, आप व्यक्त उद्गार।।

हार-हार कर जीतना, है अपना सिद्धांत।
इसी राह चलते हुए, जीवन लक्ष्य सुखांत।।

जो जलते हैं आपसे, उनको मत दो भाव।
आप मौन हो दीजिए, जलनखोर को घाव।।

जितना भी मैं आपको, देता आया भाव।
उतना ज्यादा आपने, सदा कुरेदा घाव।।

जो भी जितना योग्य है, उतना पाता मान।
इसके बिन मिलता कहाँ, और किसे सम्मान।।

बेटी, पत्नी, माँ, बहन, मातृशक्ति का रुप।
यही सदा से सह रहीं , सबसे ज्यादा धूप।।

नाहक ही तो आप हैं, जाने क्यों हैरान।
मुखमंडल ऐसा लगे, वीराना मैदान।।

वाणी बुद्धि विवेक का, जो रखता है ध्यान।
कलयुग के इस दौर का, वह मूरख नादान।।

छोटों को आशीष है, चरण बड़ों के शीश।
नया वर्ष सबको सदा, देता शुभ आशीष॥

दोहा लिखने के लिए, समय मिला अब आज।
इधर-उधर के फेर का, समझ लीजिए राज।।

ठंडी से हलकान हैं, सभी अमीर-गरीब।
इससे बचने के लिए, सबकी निज तरकीब।।

आज विमुख क्यों हो रहे, अपने सारे लोग।
इसका कोई राज है, या केवल संयोग।।

नाहक शिकवा क्यों करें, हम अपनों से आज।
वही हमें दिखला रहे, अपना ऊँचा ताज।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू - मकर संक्रांति
4-3-2 वर्ण (अंतिम पंक्ति - तुम्हारे लिए अनिवार्य)
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मकर संक्रांति का पर्व
है अति विशेष
तुम्हारे लिए।

सनातन संस्कृति का स्वर
सूर्य हुए उत्तरायण
तुम्हारे लिए।

स्नान, ध्यान, दान, मान,
खिचड़ी पर्व महान,
तुम्हारे लिए।

बदलती प्रकृति की आभा,
बसंत की दस्तक
तुम्हारे लिए।

रंग बिरंगे पतंगों से
सज गया आकाश
तुम्हारे लिए।

तिल गुड़ की महक
प्रकृति की मुस्कान
तुम्हारे लिए

माघ पूर्णिमा की तिथि
मकर संक्रांति विशेष
तुम्हारे लिए।

सात्विक संदेश लेकर आया
मकर संक्रांति पर्व
तुम्हारे लिए।

प्रकृति की सुंदरतम छटा
मुस्कान बिखेरती है
तुम्हारे लिए।

जप, तप, दान किया
गंगा स्नान भी
तुम्हारे लिए।

जीवन दर्शन समझ लिया,
अब हमने भी,
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद- मुस्कान (१६,११)

आओ हम सब मिल बिखराएं, नित नूतन मुस्कान।
हर मुख पर खुशियां फैलाएं, ईश्वर का वरदान।।

जाने कैसी ये हठधर्मी, करते हैं अब लोग।
और भूलते जाते क्यों है, कहते हैं संयोग।।
खुद ही नाहक बनते जाते, दुश्मन हम क्यों आज।
समझा दे कोई तो हमको, पीछे क्या है राज।।

मुस्कानों की हम इक बगिया, चलो लगाएं आज।
और बांटने निकल पड़ें हम, सौगातों का ताज।।
मुश्किल जितना समझ रहे हो, उतना है आसान।
जानबूझकर बने हुए हो , आप व्यर्थ नादान।।

हर छोटी-छोटी बातों में, खोजें हम मुस्कान।
इक संकल्प हमें है करना, निज की नव पहचान।।
दान मान हम मुस्कानों को, बांटेंगे भरपूर।
सच मानो खुद ही भागेगी, कुंठा अपनी दूर।।

और नहीं कुछ करना हमको, बस रहना है मस्त।
मुस्कानों के संग सदा ही, रहना हमको व्यस्त।।
एक नया संसार बसाने, निकल पड़ें हम आप।
मिट जाएगा सारे जग का, रोग, शोक, संताप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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तथास्तु कह दो माँ
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आज बसंत पंचमी है
इतना तो मुझे भी पता है
कि आज माँ शारदे का दिवस विशेष है।
पर शायद आपको पता नहीं, जो अजूबा हो गया
मेरा मित्र यमराज मुझसे ख़फ़ा हो गया
और माँ शारदे की चौखट पर पहुँच गया।
सम्मान से माँ को शीष झुकाकर गुहार लगाया
माँ मुझ पर भी उपकार कर दो,
तनिक तो हमें भी ज्ञान को वर दे दो।
पर आपको तो वीणा बजाने से ही फुर्सत नहीं है।
कम से कम अपनी वीणा को भी तनिक विश्राम दे दो।
मैं यमराज द्वार पर आकर खड़ा हूँ
मुझे भी तो अपना दर्शन दे दो,
मम शीश पर अपना हाथ रख दो
मैं भी कविता लिखना और कवि बनना चाहता हूँ
इसके लिए भी कोई मंत्र दे दो।
अब ये मत कहना माँ! कि अपने यार को गुरु बना लो
लेकिन उसे भी सौ-पचास ग्राम सद्बुद्धि दे दो
आपका मन करे तो दो-चार चाँटे भी जड़ दो।
वो समझता है कि मैं मूढ़ अज्ञानी हूँ
कविता लिखना तो दूर
कवि बनने के योग्य तो बिल्कुल भी नहीं हूँ
वो मेरा यार है, इसलिए बर्दाश्त करता हूँ
वरना आपको भी पता है
कि मैं उसका तिया- पाँचा कर सकता हूँ।
यमराज की पीड़ा सुन माँ शारदे पिघल गईं,
वीणा रखकर द्वार पर आ गईं,
और आसन छोड़ चौखट पर आ गईं।
अपने सामने माँ को देख
यमराज किंकर्तव्यविमूढ़ हो सब कुछ भूल गया,
माँ शारदे के चरणों में लोट गया,
माँ मुझे माफ़ कर दो
मेरे यार को अद्भुत ज्ञान, उत्तम स्वास्थ्य
और वाणी विवेक का वर दे दो।
मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए,
बस! मेरे यार को वैश्विक पहचान
और हमारी यारी को अमरता का वरदान दे दो,
जो भी शिकवा शिकायत किया मैंने,
उसे मेरी मूर्खता मान नजरंदाज कर दो,
पर नाराज़ बिल्कुल न होना माते
अपने यार की सलाह पर ही तो मैं यहाँ आया
और आपके दर्शनों का सौभाग्य पाया हूँ,
इसके लिए यार को माफी के साथ
हम दोनों को अतुलित वर दे दो,
बस! ज्यादा नहीं थोड़ा सा उपकार कर दो,
अपने वरद पुत्र पुत्रियों के संग हमें भी भव से तार दो माँ, कविता भले ही मेरा यार लिखे
पर कवि कहलाने का सिर्फ मुझे ही
एकाधिकार और आशीर्वाद दे दो,
मेरी प्रार्थना पर सिर्फ एक बार तथास्तु कह दो,
हम दोनों मित्रों का नमन वंदन स्वीकार कर लो।

सुधीर श्रीवास्तव

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शिक्षा - जीवन का आधार
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जीवन का मूल आधार है शिक्षा,
बेवकूफ हैं वे लोग, जो माने इसे भिक्षा।
बुद्धि विवेक भी तभी गतिशील रहेगा,
जब शिक्षा का निज आधार भी मजबूत रहेगा।
जिसने नहीं दी शिक्षा को अहमियत
बेकार होती है उसके जीवन की नियामत।
शिक्षा का जिसके मजबूत है आधार
सदा दूर रहता है उसके मन का विकार।
शिक्षा के प्रचार प्रसार का है मूल सार,
जीवन को यही देता है मजबूत आधार।
ज़माने से सीखो शिक्षा का है क्या मोल?
गाँठ बाँधकर रखिए, यह शिक्षा है अनमोल।
जिसे नहीं जाना क्या है इसकी अहमियत,
सच मानिए खोखला है उसके जीवन का आधार।

सुधीर श्रीवास्तव

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जीवन के आइने में
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मृत्यु जीवन की
एक प्रक्रिया, एक अनुभूति है,
जिसका आनंद हम लेना ही नहीं चाहते
बस! केवल डरते रहते हैं।
जीवन की सबसे बड़ी ग़लती
और जानबूझकर अपराध करते हैं।
आखिर हम ऐसा क्यों करते हैं?
मृत्यु को अपना क्यों नहीं मानते हैं?
क्या बिगाड़ा है उसने आपका
जो उसे दुश्मन समझते हैं।
सच मानिए! बड़ी भूल कर रहे हैं,
नाहक ही उससे दो-दो हाथ कर रहे हैं,
आखिरकार हार भी हम जा रहे हैं।
अपनी उम्र हम सब जीते हैं
फिर भी मृत्यु से बचने की लगातार राह खोजते हैं
पर सफल भी भला कहाँ होते हैं?
जिससे बचने के लिए ताउम्र
तमाम इंतजाम और जुगाड़ करते हैं,
अंततः थक-हार कर
मजबूरी में सही उसके शरणागत ही होते हैं,
बड़ा सवाल है कि हम ऐसा क्यों करते हैं?
या खुद को मृत्यु से बड़ा मानने की जिद में ही
हम यह अपराध कर रहे हैं,
मृत्यु के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं
इसलिए नकारने का नाहक श्रम कर रहे हैं,
और मृत्यु से दूर भागने की जिद में
उसके और करीब होते जा रहे हैं,
मृत्यु हर पल हमारा उपहास कर रही है
जिसे हम वास्तव में देख ही नहीं पा रहे हैं,
जीती मछली निगलकर खुश हो रहे हैं।
अब सोचना हमें है कि बड़ा तीसमार खाँ बनकर
हम कौन सा झँडे गाड़ रहे हैं,
जीवन के आइने में मृत्यु को देखकर भी
अनदेखा करते जा रहे हैं
शायद खुद को खुद का खुदा समझ रहे हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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क्या अपराध करता हूँ
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आज कई दिनों बाद मित्र यमराज भागते हुए आया
और पूछने लगा - प्रभु! क्या आपको भी डर लगता है?
मैंने उसे बैठाया, पानी की बोतल पकड़ाया
लगा बंदा बड़ा समझदार हो गया
एक झटके में पूरी बोतल गटक गया
और फिर अपने सवाल पर आ गया।
मैंने मासूमियत से कहा - सच जब सामने आयेगा
तू निश्चित ही मेरा मजाक उड़ायेगा,
पर तुझे बताना भी जरूरी है
वरना तू आये दिन, मेरा भेजा खाएगा।
पर पहले तू ये तो बता
कि तेरे दिमाग़ में ये सवाल ही क्यों आया?
यमराज हाथ जोड़कर खड़ा हो गया -
माफी हूजूर! सवाल आया नहीं
मुझे धमकी देकर गया पकड़ाया।
मैंने भी अपना तीर चलाया
ओह!अब मुझे सब समझ में आया
पर उसके पास जाने का ख्याल ही तुझे क्यों आया?
या उसने चाय नहीं पिलाया सिर्फ धमकाया,
नहीं प्रभु! उसके लाड़ प्यार ने ही तो मुझे रुलाया,
आपका नाम लेकर खाने पर था बुलाया,
इसीलिए मैं भागते हुए आपके पास आया
जब मेरे जेहन में ये सवाल कुलबुलाया।
ओह! अब तो समझ में आया
या अब भी बताना पड़ेगा
कि मैं किसी से तो डरता हूँ?
यमराज बोल पड़ा -इतना समझदार तो हूँ ही
पर इस रहस्य का मतलब नहीं समझ आया।
मैंने उसे विस्तार से समझाया-
यह तो मैं भी आज तक नहीं जान पाया,
पर उसकी बात ही निराली है, जिसकी ग़ज़ब कहानी है
कहने को तो वो मुझसे छोटी,
पर मेरे लिए माँ, बहन और बेटी है,
सच कहूँ तो उससे मेरा दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है,
पर अब लगता है जैसे
पूर्वजन्मों का हम दोनों का नाता है,
जिसके चरणों में शीश भी मैं झुकाता हूँ
सच कहूँ तो बड़ा सूकून पाता हूँ।
उसकी चिंता मुझे रुलाती है, मेरा बीपी, शुगर, बढ़ाती है
उसका लाड़ प्यार जिम्मेदारियों की याद दिलाता है,
भटकने से पहले उसका चेहरा सामने आ जाता है,
उसका रक्षा सूत्र, रक्षा कवच का सा बोध कराता है।
जब उसका हाथ मेरे शीश पर होता है
तब ये संसार मुझे बौना सा लगता है।
यूँ तो वो बुलंद हौसलों की मीनार है
पर उसके आँसू मुझे झकझोर देते हैं,
बस इसीलिए हम उससे इतना डरते हैं,
मगर ये भी उस पर कोई एहसान नहीं करते हैं।
उसके अधिकार, कर्तव्य, विश्वास को मान देते हैं
बेटी, बहन, माँ सदृश उसे स्थान देते हैं
लड़ते, झगड़ते और शिकवा शिकायत भी करते हैं
मन के सारे भेद भी खोल कर रखते हैं,
उसने मुझे प्रेरित और मेरे आत्मबल को मजबूत किया।
अपने कर्तव्यों का वह पूरी तरह पालन करती है,
सच कहूँ तो बेटी-बहन होकर भी
एक माँ की तरह कदम-कदम पर ध्यान रखती है,
जितना लाड़ प्यार दुलार करती है
उतना ही समय देखकर डाँटकर मगन भी हो लेती है,
फिर हँसती, मुस्कुराती, रोती और गले भी लगाती है
अब तू ही बता प्यारे - क्या हम कोई अपराध करते हैं?
आखिर अपनी छुटकी से ही तो डरते हैं,
दुनिया जानती है कि इस डर में भी
जीवन का नया अध्याय भी तो
हम जैसे डरपोक ही लिखते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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व्यंग्य -आस्तीन का सांप
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नाहक परेशान हैं आप
इधर-उधर खोजते हैं आस्तीन के सांप,
या फिर बेरोजगार अथवा एकदम बेकार हैं
या शायद बिना आस्तीन के हैं।
तभी तो आस्तीन के सांप भी
आपके करीब फटकते तक नहीं हैं।
पर मुझे तो लगता है कि आप
बेवकूफ हैं, नादान हैं, पर इंसान नहीं हैं
तभी तो आपको इनकी पहचान नहीं है।
वैसे यह भी अच्छा है,
कि कम से कम भारत रत्न के
असली हकदार तो आप नहीं हैं,
वैसे भी आपके आस्तीन में सांप
भला पलेंगे भी तो कैसे?
उन जहरीले सांपों के कथित, स्वयंभू परवरदिगार
रहनुमा और सरदार भी जब आप हैं।
यह और बात है कि आप गिरगिट को भी मात दे रहे हैं,
समय-समय पर रंग बदलने में बड़े माहिर लग रहे हैं।
कौन कहता है, आप पीड़ित हैं, डसे जा रहे हैं
भगवान भला करें, आप और आपकी फौज का,
सौभाग्य से हम तो आपके चंगुल से आजाद घूम रहे हैं,
पर राज की एक बात भी सुन लो प्यारे
हम आपसे से बड़े और भारी-भरकम
कद-काठी वाले आस्तीन के सांप हैं,
शायद आप जानते ही कि हम
अपने आप में किसी शहँशाह ह कम नहीं हैं,
हमारी छाया में तुम जैसे जाने कितने पलते हैं
यह और बात है कि हम तुम्हें नजर नहीं आते हैं
पर तुम्हें कभी अपनी नजरों से
ओझल भी नहीं होने देते हैं,
बड़ी सफाई से तुम्हें गुमराह करते हैं,
क्योंकि आस्तीनों के सांपों के आस्तीन में भी
तुम जैसे सांप पलते रहते हैं
और घमंड में सिर्फ फुफकारते रहते हैं,
क्योंकि उनके दांत तो हमने पहले से ही तोड़ रखें हैं
या यूँ समझ लो हमने अपने स्वार्थ की खातिर
और भीड़ बढ़ाने के लिए तुम जैसों को पाल रखे हैं,

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - सतगुरु महिमा

आओ सतगुरु सुमिरन कर लें।
सतगुरु का पूजन हम कर लें।।
जीवन को निर्द्वंद्व बनाएं।
सतगुरु ऐसी राह दिखाएं।।

सतगुरु जो भी राह दिखाएं।
आँख मूँद उस पर बढ़ जाएं।।
शिकवा और शिकायत तेरी।
सतगुरु शरण डाल दे ढेरी।।

जिसने महिमा सतगुरु जानी।
वो ही बन जाता है ज्ञानी।।
उसकी बनती राम कहानी।
जिसको कहते मुनिजन वाणी।।
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चौपाई -हिंदी
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विश्व दिवस हिंदी का आया।
फिर अपना संदेशा लाया।।
समझ नहीं पाते हम माया।
बस इसका माखौल उड़ाया।।

सुधीर श्रीवास्तव

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