सरसी छंद- मुस्कान (१६,११)
आओ हम सब मिल बिखराएं, नित नूतन मुस्कान।
हर मुख पर खुशियां फैलाएं, ईश्वर का वरदान।।
जाने कैसी ये हठधर्मी, करते हैं अब लोग।
और भूलते जाते क्यों है, कहते हैं संयोग।।
खुद ही नाहक बनते जाते, दुश्मन हम क्यों आज।
समझा दे कोई तो हमको, पीछे क्या है राज।।
मुस्कानों की हम इक बगिया, चलो लगाएं आज।
और बांटने निकल पड़ें हम, सौगातों का ताज।।
मुश्किल जितना समझ रहे हो, उतना है आसान।
जानबूझकर बने हुए हो , आप व्यर्थ नादान।।
हर छोटी-छोटी बातों में, खोजें हम मुस्कान।
इक संकल्प हमें है करना, निज की नव पहचान।।
दान मान हम मुस्कानों को, बांटेंगे भरपूर।
सच मानो खुद ही भागेगी, कुंठा अपनी दूर।।
और नहीं कुछ करना हमको, बस रहना है मस्त।
मुस्कानों के संग सदा ही, रहना हमको व्यस्त।।
एक नया संसार बसाने, निकल पड़ें हम आप।
मिट जाएगा सारे जग का, रोग, शोक, संताप।।
सुधीर श्रीवास्तव