Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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दोहा-कहें सुधीर कविराय ३५
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बुजुर्ग
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छाँव शीष जिनके रहे, इनकी शीतल छाँव।
उन पर चलता है नहीं, कभी किसी का दाँव।।

जो करता इनका सदा, मान और सम्मान।
ईश्वर की उस पर कृपा, दूर रहें अपमान।।

आया है कैसा समय, शर्म हया सब दूर।
मात-पिता बूढ़े हुए, हम मस्ती में चूर।।

वृद्ध जनों को मिल रहा, वृद्धा आश्रम ठौर।
अपनों में आने लगा, जब से स्वारथ बौर।।

अपने ही अब कोसते, अपनों को ही रोज।
जाने क्या हैं पा रहे, खाकर इनका भोज।।

कौन आज है आपका, शुभचिंतक सिरमौर।
मुश्किल में यदि हैं पड़े, कौन दे रहा ठौर।।
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वाणी
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वाणी बतलाती हमें, मानव का व्यवहार।
चाहे जितना हो बड़ा, उसका घर परिवार।।

कटु वाणी है छीनती, इक दूजे का चैन।
कहीं दुश्मनी हो रही, कहीं भीगते नैन।।

वाणी में क्या है रखा, नहीं समझते आप।
इसीलिए तो कर रहे, अंजाने में पाप।।

वाणी पर जिसने रखा, निज अंकुश भरपूर।
पास उसी के आ रहे, कल तक थे जो दूर।।

वाणी जिसकी मौन है, उससे डरिए आप।
नहीं छेड़ना भूल से, मिले बहुत संताप।।
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नववर्ष
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नया वर्ष छब्बीस का, लेकर आया हर्ष।
हर प्राणी खुशहाल हो, फैले नव उत्कर्ष।।

नये वर्ष में हम सभी, मिलकर करें विचार।
पावन रखना है हमें, उचित प्रेम व्यवहार।।

नये वर्ष में क्या नया, बड़ा प्रश्न है आज।
प्रेम प्यार व्यवहार सम, होगा सबका काज।।

नये वर्ष में दीजिए, मिलकर दुआ हजार।
खुशहाली से हो भरा, मम जीवन संसार।।

छोटों को आशीष है, चरण बड़ों के शीश।
नया वर्ष सबको सदा, देता शुभ आशीष॥

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गणतंत्र दिवस
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उत्सव है गणतंत्र का, हर्षित भारत देश।
संविधान गुण गा रहे, अद्भुत है परिवेश।।

लोकतंत्र सबसे बड़ा, सजा तिरंगा ताज।
सर्वधर्म समभाव का, भारत में है राज।।

संविधान का हम सभी, करते हैं गुणगान।
और तिरंगा दे रहा, हमको निज पहचान।।

आज देख कर्तव्य पथ, भारत का उत्कर्ष।
दुश्मन सब बेचैन हैं, शुभचिंतक में हर्ष।।

दुनिया ने जब से सुनी, महामहिम की बात।
दुश्मन सब बेचैन हैं, डर-डर काटें रात।।

संविधान की आड़ में, होते कितने खेल।
लोकतंत्र के नाम पर, भाग रही है रेल।।

अजर-अमर गणतंत्र को, दुनिया देती मान।
भारत का गौरव बढ़े, यही हमारी शान।।
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हिंदी
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हिंदी का गौरव बढ़े, ऐसा करिए काम।
नाहक में ही आप सब, होते क्यों बदनाम।।

हिंदी हमसे पूछती, बतलाओ तो आज।
कह सुधीर कैसे बनूँ, भाषा का सरताज।।
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यमराज
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भटक गये यमराज जी, जाने कैसे राह।
या जागी कुछ है नई, उनके मन में चाह।।

मुझ पर कोई अब नहीं, देता थोड़ा ध्यान।
इसीलिए यमराज जी, बाँट रहे गुरु ज्ञान।।

लगता जैसे सो गया, आज मित्र यमराज।
इसीलिए क्या थम गया, मेरा सारा काज।।

काम बहुत ही शेष है, समय छूटता हाथ। अब केवल यमराज ही, दे सकता है साथ।।

मंजिल अपनी आ गई, अब तो यारों पास।
आप सभी को है पता, यम अपने हैं खास।।
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विविध
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नाहक मन में है भरा, इतना अधिक गुबार।
या फिर केवल चाहते, ठनी रहे ये रार।।

मन का मैल निकालिए, यही समय की माँग।
या फिर तोड़ें आपकी, हम सब मिलकर टाँग।।

भलमानुष इतना नहीं, बनकर रहिए आप।
कल पछताने से भला, नहीं करो ये पाप।।

कौन दे रहा आपको, भला आजकल भाव।
नाम एक बतलाइए, नहीं कुरेदे घाव।।

जन्मदिवस है अटल का, आज बहुत ही खास।
स्वामी अद्भुत गुणों के, संग हास परिहास।।

तुलसी पूजन खास है, सभी पूजिए आज।
श्रद्धा अरु विश्वास से, करते रहिए काज।।

ठंडी दुश्मन बन रही, राजा हो या रंक।
नाहक लेती स्वयं ही, अपने शीश कलंक।।

तीन दिवस प्रतिभाग कर, लौट गया से मित्र।
समझक्ष नहीं आता मुझे, खींचूँ कैसे चित्र।।

संचालक सब आलसी, या फिर कोई रोग।
या नाहक हैरान हूँ, सब हैं स्वस्थ निरोग।।

मायूसी को छोड़ दो, मत हो आप अधीर।
इससे तो अच्छा भला, बनकर रहो कबीर।।

समय बड़ा बलवान है, इसका रखिए ध्यान।
मूरख हो तुम क्या बड़े, गाते नीरस गान।।

कुछ बड़बोले लोग हैं, सदा बघारें ज्ञान।
नहीं समझते वे कभी, उनका अलग विधान।।

चाह रहे जो हम सभी, रहा न उसका अंत।
यही हमें समझा रहे, ज्ञानी मुनिजन संत।।

कहना मानोगे नहीं, बुद्धिमान हो आप।
बेवकूफ हम भी नहीं, नाहक करते जाप।।

मौन छोड़ कर आइए, सभी पटल के द्वार।
कम ज्यादा कुछ कीजिए, आप व्यक्त उद्गार।।

हार-हार कर जीतना, है अपना सिद्धांत।
इसी राह चलते हुए, जीवन लक्ष्य सुखांत।।

जो जलते हैं आपसे, उनको मत दो भाव।
आप मौन हो दीजिए, जलनखोर को घाव।।

जितना भी मैं आपको, देता आया भाव।
उतना ज्यादा आपने, सदा कुरेदा घाव।।

जो भी जितना योग्य है, उतना पाता मान।
इसके बिन मिलता कहाँ, और किसे सम्मान।।

बेटी, पत्नी, माँ, बहन, मातृशक्ति का रुप।
यही सदा से सह रहीं , सबसे ज्यादा धूप।।

नाहक ही तो आप हैं, जाने क्यों हैरान।
मुखमंडल ऐसा लगे, वीराना मैदान।।

वाणी बुद्धि विवेक का, जो रखता है ध्यान।
कलयुग के इस दौर का, वह मूरख नादान।।

छोटों को आशीष है, चरण बड़ों के शीश।
नया वर्ष सबको सदा, देता शुभ आशीष॥

दोहा लिखने के लिए, समय मिला अब आज।
इधर-उधर के फेर का, समझ लीजिए राज।।

ठंडी से हलकान हैं, सभी अमीर-गरीब।
इससे बचने के लिए, सबकी निज तरकीब।।

आज विमुख क्यों हो रहे, अपने सारे लोग।
इसका कोई राज है, या केवल संयोग।।

नाहक शिकवा क्यों करें, हम अपनों से आज।
वही हमें दिखला रहे, अपना ऊँचा ताज।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112014815
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