[30]
‘शैल को गए इतना समय हो गया। अभी तक नहीं लौटा। क्या कभी नहीं लौटेगा?’
‘संभव है सारा, सब कुछ संभव है।’
‘मैं जानती हूँ कि दोष मेरा है किन्तु मुझे अपना पक्ष रखने का एक अवसर भी नहीं दिया शैल ने?’
‘इतना सब कुछ जानकर किस बात पर तुम अपना पक्ष रखती? क्या उस पर शैल विश्वास करता?’
‘नहीं। कोई भी विश्वास नहीं करता। किन्तु एक बार बात को सुन लेता। पश्चात वह चले जाता, मुझ पर अप्रसन्न रहता, क्रोध करता तो भी मैं सह लेती।’
‘अब तो वह संभव नहीं है सारा।’ सारा ने स्वयं से बात बंद कर ली। आँखें बंद कर ली। उद्विग्न मन लेकर बैठी रही। जब विजेंदर का फोन आया, उससे बात की तो उसका अशांत मन अधिक अशांत हो गया।
वह उठी, नदी में जाकर मुंह धोया, पानी पिया। पानी की शीतलता और शीतल हवा ने सारा को शांत कर दिया। नदी में पग रखे हुए वह खड़ी रही। नदी का प्रवाह उसे स्पर्शता हुआ अपने मार्ग पर आगे बढ़ता रहा। नदी का घोष उसे अच्छा लगा। उसे सुनते हुए सारा नदी में निश्चल सी खड़ी थी, जैसे कोई जल प्रतिमा हो! नदी के साथ साथ समय का प्रवाह भी चलता रहा।
समय की एक बूंद ने सारा को कुछ शब्द सुनाए। “सारा जी, आओ। भोजन कर लेते हैं।”
भ्रमणा मानते हुए सारा ने उन शब्दों को अनसुना कर दिया।
समय की दूसरी बूंद ने भी यही शब्द घोष किया। “सारा जी, आओ। भोजन कर लेते हैं।”
वह घोष नदी के घोष से भिन्न था, सारा उसकी अवगणना नहीं कर पाई। उसने शब्द की दिशा में देखा। वह अचंभित रह गई। सहसा वह रोने लगी। सम्मुख उसके शैल खड़ा था, वह उसे देखती रही, रोती रही।
“सारा जी, भोजन का समय तो निकल गया है। मैं जानता हूँ कि आपने कुछ नहीं खाया है। चलो, खा लो।”
सारा ने स्वयं को संभाला। “शैल, तुम?” वह आगे बोल न सकी।
“सारी बातें भोजन के पश्चात। अभी खाना खा लो।”
“नहीं। मुझे नहीं खाना।”
“क्यों?”
“मुझे भूख नहीं है।”
“भूख तन को लगती है, मन को नहीं। खिन्न मन का त्याग करोगे तो भूख की प्रतीति होगी।”
“मैंने कहा न, मुझे भूख नहीं है?”
“अब मान भी जाओ। बड़े लोग हठ नहीं करते।”
“यह हठ नहीं है शैल, मेरे कर्मों का दंड है।”
“दंड तो जगत नियंता देते हैं, मनुष्यों को स्वयं को दंड देना का अधिकार नहीं है। और जो कर्म, जो अपराध आपने किया ही नहीं उसका दंड कैसा?” शैल ने कहा।
“क्या?”
“यह सत्य है कि आपको यहाँ जिस उद्देश्य से भेजा गया था वह निश्चय ही अपराध का कर्म है किन्तु अभी तक तो आपने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है तो दंड का औचित्य नहीं है।”
“तुम क्या कह रहे हो, शैल?”
“जो मुझे प्रतीत हो रहा है वही कह रहा हूँ।”
“तो क्या तुम मुझ पर विश्वास करते हो?”
“हाँ, करता हूँ।”
“तो मुझ पर अप्रसन्न क्यों हो?”
“तब था, अब नहीं हूँ।”
सारा के मुख पर प्रश्न थे।
“बाकी सब भोजन के पश्चात। मुझे तो खूब भूख लगी है।” शैल भोजन खोलकर बैठ गया। सारा भी आकर बैठ गई। दोनों ने मौन ही भोजन सम्पन्न किया।
( ) ( ) ( )
शैल के फोन की घंटी बजी, “बोलो विजेंदर।”
“आप कहाँ थे? मैंने कई बार प्रयास किया।”
“वह बंद था। अब चालू रहेगा। कहो क्या बात है?”
“प्रथम तो बता दूँ कि मैंने एक घंटे पूर्व सारा जी से बात की थी। वह रो रही थी।”
“अब वह मेरे साथ ही है, प्रसन्न हैं. भोजन भी कर लिया है। दूसरी बात है कुछ?”
“मीरा घटना की सभी सामग्री के साथ मुझे नदीम ने बुलाया था।”
“क्या? तुमने उसे दी तो नहीं?”
“देना पड़ा। आदेश तो मानना पड़ेगा न?”
“ओह।”
“वह सब उन्होंने राहुल और सोनिया को दे दी। अब वे दोनों मीरा घटना को देखेंगे।”
“धत्त तेरी की। अब वे दोनों अन्वेषण करेंगे?” विजेंदर मौन रहा।
“और क्या सूचना दी है नदीम ने उन दोनों को?”
“मुझे शीघ्र ही कक्ष से बाहर जाने को कहा तो मैं चला गया। किन्तु कुछ बात अवश्य है। कोई योजना बनाई जा रही थी उस कक्ष में।”
“कैसी योजना?”
“मुझे ज्ञात नहीं है। किन्तु प्राय: आधे घंटे तक दोनों नदीम के कक्ष में थे।”
“ओहो हो।”
“अब क्या होगा?”
“देखते हैं क्या होता है। तुम अपने आँख कान खुले रखना।” शैल ने फोन समाप्त किया।
सारा ने शैल को प्रश्नार्थ दृष्टि से देखा। शैल ने सारी बात सारा को बता दी।
“कौन है यह दोनों? क्या नाम बताया?”
“राहुल और सोनिया। बड़े शातिर हैं। किसी को भी फँसाकर मीरा घटना का रहस्य प्रकट करने का दावा कर देंगे और मीरा घटना बंद कर दी जाएगी।”
“तो सत्य तो सदैव अद्रश्य ही रहेगा क्या? सत्य का क्या होगा?”
“सत्य की किसे चिंता है यहाँ? सत्य से सभी भागते रहते हैं।”
“यह तो अनुचित है।”
“उन दोनों की यही कार्य पद्धति है। यही उनका चरित्र है। नदीम का पूरा पूरा सहयोग है उनको।”
“यह तो पाप है।”
“पाप या पुण्य उनके शब्दकोश के शब्द नहीं हैं। वैसे तो नदीम, राहुल, सोनिया सब केवल मोहरे हैं।”
“तो खिलाड़ी कौन है?”
“बहुत बड़े हैं वे। अद्रश्य रहते हैं।”
“तो अब क्या करेंगे?”
“क्या करना चाहिए, सारा जी?”
“अभी तो कुछ भी नहीं सूझ रहा है।” सारा मौन हो गई। शैल भी।
“राहुल और सोनिया को प्रमाण के लिए मूल घटना स्थल तक तो जाना ही पड़ेगा न? उसे ढूँढना तो पड़ेगा ना?” सारा ने सहसा अपनी बात कह दी।
“नहीं, उन्हें ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है।”
“वह कैसे?”
“प्रमाणों और साक्ष्यों का सर्जन किया जाएगा। किसी निर्दोष गरीब को खरीदकर दोषित सिद्ध किया जाएगा। उन दोनों को एक और चंद्रक मिल जाएगा।”
“आप जैसे निष्ठावान व्यक्ति कैसे टिक सकते हैं इन परिस्थितियों में?”
“बस टिक जाते हैं, जैसे आप अपने देश में टिकी हुई हैं। बिना चंद्रक के, बिना किसी प्रतिष्ठा के।”
“यहाँ भी वही भ्रष्ट स्थिति है जो वहाँ है।”
“स्वयं को बचाए रखना है हमें।”
“कितना कठिन है यह सब!”
“सरल मार्ग हमारे लिए नियति ने रखा ही नहीं है, सारा जी।”
“तो अब कौन से कठिन मार्ग पर चलना है, शैल?”
“मूल घटना स्थल की खोज चालू रखनी है।”
“मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगे?”
“जब तक आप मेरा विश्वास नहीं तोड़ोगी, मैं आपके साथ रहूँगा।”
“मैं वचन देती हूँ।” शैल ने सारा की बात सुनकर संतोष प्रकट किया।
“राहुल और सोनिया के विषय में पूरी बात कहो, शैल।” सारा ने उत्कंठा से पूछा।
“राहूल राहुल खान है। और सोनिया सोनिया पीटर है।”
“तो क्या राहुल मुसलमान है? सोनिया ख्रिस्ती है?”
“नहीं, हिन्दू है। सेक्युलर हिन्दू। सोनिया भी सेक्युलर हिन्दू है।”
“तब तो वे दोनों तटस्थ होंगे न?”
“हमारे यहाँ सेक्युलर का अर्थ भिन्न है। राहुल मुस्लिम से बढ़कर मुसलमान है और सोनिया ख्रिस्ती से बढ़कर ख्रिस्ती।”
“वह कैसे?”
“हिन्दू परिवार में जन्म लेने के पश्चात दोनों देश की ऐसी विश्वविद्यालय में पढे हैं जो भारतीय संस्कृति की शत्रु है।”
“अर्थात जे एन यु?”
“हाँ। आपने कैसे जाना?”
“तब तो दोनों निहारिका के चेले हैं।”
“इन दोनों को मीरा घटना सौंपने का अर्थ अनर्थ ही है।”
“हमें कुछ करना चाहिए। इन लोगों को रोकना चाहिए।”
“जब तक नदीम जैसे अधिकारी हैं, यह संभव नहीं है।”
“नदीम के स्थानांतरण के पश्चात?”
“दूसरा नदीम आएगा। यह चलता रहेगा।”
“तुम इतने निराश क्यों हो रहे हो, शैल?”
“क्यों कि भारत में सरकार किसी की भी हो, सिस्टम तो वामपंथियों की ही है। प्रत्येक छोटी सी कचेरी से लेकर सर्वोच्च
न्यायालय तक।”
“यह शब्द तो सुने हैं किसी से?”
“सपन और निहारिका ने आपसे कहे थे, हैं न?”
“हाँ यही तो, शैल तुम तो अंतर्यामी हो।”
“ऐसी कोई बात नहीं है। किन्तु ऐसा हम सदैव सुनते हैं, देखते हैं, अनुभव करते हैं। इतने वर्षों की नौकरी में ऐसा अनेकों बार अनुभव किया है। हमारे लिए यह नई बात नहीं है।” कहते कहते शैल के मुख पर पीड़ा के भाव उभर आए। सारा ने उन भावों को ध्यान से देखा। आगे कुछ कहकर पीड़ा बढ़ाने का पाप न करने का उसने सोच लिया। मौन हो गई।