Antarnihit - 31 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 31

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अन्तर्निहित - 31

[31]

सोनिया और राहुल ने मीरा घटना के सभी कागजों, फ़ाइलों, चित्रों, रिपोर्टों, चलचित्रों आदि का अभ्यास प्रारंभ कर दिया। तीन दिनों के पश्चात दोनों नदीम के कक्ष में थे। 

“हमारे पास एक प्रस्ताव है। आपकी अनुमति चाहिए।” सोनिया ने कहा। 

“क्या प्रस्ताव है? पूरी बात कहो। बैठो। क्या पीओगे? ठंड या गरम?”

“अभी तो कार्यालय में हैं, गरम ही पियेंगे।” राहुल ने गूढ़ार्थ में कहा। 

“कार्यालय के पश्चात ठंडा ही पिलाते हो न?” सोनिया ने नदीम को छेड़ा। सोनिया के वदन पर उभरे भावों में नदीम के लिए आमंत्रण था। नदीम ने उसे पढ़ लिया। उसने एक कुटिल स्मित दिया। सोनिया और राहुल ने अपनी पूरी योजना और प्रस्ताव नदीम के समक्ष रखा। नदीम को उसे सुनकर प्रसन्नता हुई। 

“वाह, क्या योजना है आप दोनों की! वाह वाह। आप दोनों में से यह किसकी योजना है?” नदीम ने पूछा । 

“मेरी।” “मेरी।” उत्साह से राहुल और सोनिया एक साथ बोल पड़े। 

क्षण में ही सुधार करते हुए बोले, “हम दोनों की यह योजना है।”

नदीम ने प्रस्ताव को अनुमति दे दी। दोनों योजना पर शीघ्रता से काम करने लगे। 

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“डीएनए परीक्षण का रिपोर्ट आ गया है, महाशय।” विजेंदर ने शैल को फोन पर सूचना दी। 

“क्या कहता है वह?”

“विशेष कुछ नहीं।”

“यह तो ज्ञात हो गया होगा कि मीरा किस अनुवंश की है।”

“नहीं। लिखा है कि डीएनए परीक्षण विफल हो गया है। मीरा का डीएनए किसी भी अनुवंश से मिलता नहीं है।”

“क्या? ऐसा कैसे हो सकता है?”

“यही सत्य है, यही इस रोपर्ट में लिखा है।” 

“यह तो आश्चर्य है। ठीक है, और क्या जानकारी है?”

“एक घंटे पूर्व सोनिया और राहुल नदीम के कक्ष में गए थे। जाते समय दोनों उत्साह से भरे थे।”

“और लौटते समय?”

“लौटकर आए तब उनका वह उत्साह अधिक बढ़ गया था। दोनों अत्यंत प्रसन्न दिख रहे थे।”

“तब तो अवश्य ही कोई चिंता की बात होगी किसी निर्दोष के लिए। क्या बात थी, कुछ ज्ञात हुआ?”

“नहीं विदित हुआ है। आपके सामने भी कुछ बात हो सकती है।”

“उसकी मुझे कोई चिंता नहीं है। मुझे तो किसी अज्ञात निर्दोष की चिंता हो रही है। कौन होगा वह अभागा?”

“जानकारी प्राप्त होते ही बात दूंगा।”

“सतर्क रहना, विजेंदर।” फोन सम्पन्न हो गया। 

फोन पर हो रही बातों से अनुमान करने का प्रयास कर रही सारा ने आँखों से ही शैल को प्रश्न पुछ डाले। शैल ने उत्तर देते हुए सारी बातें कह दी। 

“यदि ऐसी बात है तो निश्चित ही चिंता की बात है, शैल।”

“और एक नए रहस्य की भी।”

“वह कैसे?”

“डीएनए परीक्षण का विफल होना, मीरा का डीएनए का किसी भी अनुवंश से न मिलना ही बड़े सहस्य की बात है। आज तक यह परीक्षण किसी के लिए विफल नहीं रहा।”

“वह तो है ही। किन्तु इससे अन्वेषण में कोई लाभ भी नहीं हो सकता था।”

“किन्तु मीरा की मृत्यु के साथ स्वयं मीरा रहस्य बन रही है। मीरा अपने साथ कैसे कैसे रहस्यों को लेकर आई है?”

“और वह भी मृत होकर! यदि जीवित आती तो?”

“तो कोई रहस्य ही शेष नहीं रहता।”

“यहाँ तो रहस्य जीवन में नहीं, मृत्यु में छिपा है। कैसी विस्मयभरी घटना है?”

सारा ने लंबा नि:श्वास लेते हुए कहा। शैल मौन हो गया, गहन विचार में डूबा हुआ अनंत आकाश को देखता रहा। 

“चलो, आगे चलें?” सारा ने बात करने का प्रयास किया। शैल ने कुछ नहीं कहा। बस चलने लगा। सारा भी उसका अनुसरण करते हुए चलने लगी। चलते चलते दोपहर ढल गई। तब मार्ग में किसी को देखकर सारा रुक गई। 

“शैल, तुमने कुछ देखा?”

“आप उन दो व्यक्तियों की बात कर रही हो जो ब्रह्मचारी के वेश में थे? जो अभी अभी यहाँ से गए हैं?”

“हाँ, वही।”

“देखा है, तो?”

“इसका अर्थ है कि समीप ही कोई ऋषि या संत का निवास है। क्या कहते हैं उस निवास को?”

“आश्रम या गुरुकुल।?”

“हाँ। आश्रम और गुरुकुल निकट ही होगा।”

“हाँ, अवश्य होगा।”

“वहाँ चलते हैं। आज रात्री वहाँ विश्राम करते हैं।”

“नहीं, नहीं। हमारे कारण उन्हें व्यवधान हो सकता है।”

“शैल, इतने दिनों से खुले आकाश के नीचे पत्थर की शिलाओं पर या किसी वृक्ष के नीचे धरती पर हमने रात्री व्यतीत की है। ठंड को सहा है। वनचरों का भय भी सहा है। आज यदि एक रात्री आश्रम के कक्ष में कुछ विश्राम कर लेंगे तो? मुझे नहीं लगता कि कोई भी संत हमें आश्रय देने में कोई संकोच करेंगे। संत बड़े दयालु होते हैं।”

“संतों के विषय में आप इतना विश्वास से कैसे कह सकती हैं? आप तो मौलानाओं से परिचय रखती हैं?”

“मैं दोनों से परिचय रखती हूँ।”

“दोनों से?”

“पाकिस्तान में मौलानाओं से परिचय होना स्वाभाविक है।”

“किन्तु संतों का परिचय?”

“धैर्य रखना होगा शैल। बताती हूँ। आओ बैठो यहाँ, नदी के प्रवाह से तन को धो डालो, मन को शांत कर डालो।”

“वह तो ठीक है, आप अपनी बात कहो।”

“बात सुनने के लिए धैर्य और मन की सज्जता आवश्यक होती है। कर सकते हो?”

“क्या कोई रहस्य का उद्घाटन करने जा रही हो?” 

सारा ने कुछ नहीं कहा। नदी के समीप गई। हाथ मुंह धोए। स्वस्थ होकर तट पर पड़ी एक शीला पर जाकर बैठ गई। शैल ने सारा का अनुकरण किया, दूसरी शील पर बैठ गया। नदी के प्रवाह से आता हुआ मंद मंद समीर दोनों के तन को स्पर्श करता हुआ बहने लगा। दोनों को यात्रा के श्रम से कुछ मुक्ति मिली। शैल प्रतीक्षा करने लगा, सारा के शब्दों का। 

शैल की प्रतीक्षा का अंत करते हुए सारा ने कहा, “शैल, 1947 की भारत विभाजन की बात से तो तुम परिचित हो।”

“हाँ।” शैल ने रुचि प्रकट की। 

“हमारा परिवार पूर्व बंगाल के किसी छोटे से गाँव में रहता था। 1927 में वहाँ से हम वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब में आ बसे। हमारे पूर्वजों ने वहाँ व्यापार प्रारंभ किया। व्यापार चलने लगा। धन जमा होने लगा। हमने पंजाब में दो कोठियाँ खरीद ली। उस समय भी हमारे पास कार थी। घोड़े थे, तांगे थे। हमारे परिवार का बड़ा सम्मान था उस समय पूरे प्रांत में।” सारा रुकी। भूतकाल के किसी क्षण को जैसे वह अपने भीतर अनुभव कर रही हो। शैल उसे अनिमेष जिज्ञासा के साथ देखता रहा। 

सारा ने समय के उस बिन्दु से आगे बढ़ते हुए कहा, “पश्चात वर्ष आया 1947 का! देश की स्वतंत्रता का समय। स्वतंत्रता? हमारे साथ इस शब्द से बड़ी कोई छलना नहीं हुई। वास्तव में वह देश विभाजन का समय था। हमारे नेताओं की, विशेष रूपसे गांधी और नेहरू की विफलता की वह घटना थी। उस विफलता को स्वतंत्रता जैसा सुंदर नाम देकर सफलता के रूप में प्रस्तुत कर दिया। हमारी मति को भ्रमित कर दिया गया। स्वतंत्रता नामके नए शब्द के नशे में डुबो दिया। हम जिसे मुक्ति समझ रहे थे वह तो वास्तव में एक छलना थी, भ्रम था, षड्यन्त्र था। उस समय हम वह समझ न सके। अंतत: देश का विभाजन हो गया।” सारा रुक गई। उसके मुख पर बीते हुए समय का कोई गहरा घाव भाव बनकर उभर आया। शैल ने उसे देखा। 

‘कोई तीव्र वेदना, अत्यंत पीड़ा प्रतीत हो रही है साराजी के शब्दों में। कुछ तो है जिससे आज भी उसका मन घाव से भरा है, ह्रदय छलनी छलनी हो चुका है। विभाजन की पीड़ा के विषय में बहुत सुना है, पढा है किन्तु वह सब परोक्ष ज्ञान था। साराजी  जो कह रही है, कहने जा रही है वह प्रत्यक्ष है। परोक्ष बातों से कभी किसी की पीड़ा का अनुमान या अनुभव नहीं हो सकता। यह तो प्रत्यक्ष से ही संभव है। क्या आज साराजी की पीड़ा का प्रत्यक्ष अनुभव मुझे विचलित कर देगा?’

“ओ ईश्वर, मुझे शक्ति देना उसे सहने की।” शैल बोल पड़ा। 

“क्या कहा, शैल?”

“कुछ नहीं।”

“कुछ हुआ क्या?”

“नहीं, नहीं। आप कहिए, आगे क्या हुआ?”