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“विभाजन के साथ ही प्रारंभ हुआ स्थानांतरण। लाखों लाखों लोग अपने स्थायी स्थान को छोड़कर अच्छे और सुरक्षित भविष्य के सपने साथ लिए चल पड़े दूसरे देश में जाने को। भारत से पाकिस्तान, तो पाकिस्तान से भारत जाने वाले लोगों का समुद्र सीमाओं पर लहराने लगा।
भारत से पाकिस्तान आनेवाले सभी सुरक्षित और सकुशल आ गए किन्तु पकिस्तान से चलनेवाले लाखों लाखों व्यक्तियों में से केवल कुछ हजार ही भारत पहुँच सके। बाकी सभी ने अपने प्राण सीमाओं को पार करने से पूर्व ही गंवां दिए। जो भारत पहुँच सके थे उनमें से भी अधिकतर क्षत विक्षत थे। कोई कुशल नहीं था। सभी ने अपना कुछ न कुछ खोया था। उस देश, जो कभी उसका ही देश था, की सीमा पार कर इस देश में प्रवेश करने का मूल्य चुकाया था उन्होंने। कैसा मूल्य, जानते हो?”
शैल के पास कोई उत्तर नहीं था। उसने अपने भावों से ही पूछा, “?”
“अपनी धन संपत्ती तो सभी ने खोई थी। जो सबसे मूल्यवान खोया था वह था अपनों को। मां, बहन, पिता, भाई, पुत्र। मित्र, शत्रु! किसी न किसी को वहीं सीमा के उस पार मृत छोड़कर भागे थे सभी। जो जीवित रहे उनके अंगों को काटा गया, स्त्रियों का बलात्कार किया गया। अनेक स्त्रियों ने तो निर्वस्त्र अवस्था में भारत में प्रवेश किया। किन्तु, भारत प्रवेश से उनकी यातनाओं का अंत नहीं आया।” सारा ने कुछ घूंट पानी पिया, आंसुओं के घूंट भी। उसकी आँखों में उमडती वेदना का, मुख पर उभरी पीड़ा का शैल प्रत्यक्ष अनुभव करता रहा। मन उसका भी घावों से भर गया, ह्रदय तीव्र व्यथा से भर गया। किसी प्रकार से प्रयत्न पूर्वक उसने अपने आंसुओं को रोके रखा था। अपने आंसुओं से वह सतलज नदी के प्रवाह को अपवित्र नहीं करना चाहता था। अभी तक वह उसमें सफल रहा था किन्तु इससे उसे बड़ा कष्ट हो रहा था। वह उसे सहता रहा, मौन रहकर। स्थिर होकर।
“भारत की सीमा में प्रवेश करनेवाले प्रत्येक को अपना कुछ न कुछ छूट जाने का, कुछ न कुछ खोने का दु:ख अवश्य था तथापि भारत में अपने सुरक्षित भविष्य की आशा से बलात प्रसन्न हो रहे थे। वह प्रसन्नता उनकी नियति में थी ही नहीं। क्यों कि भारत में उनकी नियति विधाता ने नहीं, गांधी ने लिखनी थी।
गांधी? महात्मा गांधी! एक ऐसा महात्मा जिसे कभी विस्थापितों की वेदना, पीड़ा, कष्ट, दु:ख, यातना, समस्या आदि की चिंता ही नहीं थी। उसके मन में विस्थापितों के लिए क्या जाने क्या घृणा थी, क्या तिरस्कार था? विस्थापित सभी हिन्दू थे। उनका कष्ट देखकर उस महात्मा को कोई विशेष आनंद प्राप्त हो रहा था। उसे ‘महात्मा’ कहना विश्व के सभी संतों और ऋषियों का अपमना है।” सारा थक गई, बोलते बोलते। रुकी। गहन श्वास लेने लगी। अब जो बात वह कहने जा रही थी उसके लिए स्वयं को वह सज्ज कर रही थी। हिम्मत और साहस जूटा रही थी। उसे समय लगा सज्ज होने में।
“भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों के घर, मस्जिद, मदरसे भारत के गांवों में खाली होते गए। वैसे ही पाकिस्तान में घर, मंदिर, दुकानें आदि की स्थिति बनती गई। पाकिस्तान में प्रवेश करते ही मुसलमान उन हिंदुओं के खाली घरों और मंदिरों में घुस गए, उसे भोगने लगे। उन्हें वहाँ घर – निवास सरलता से मिल गए। कुछ ही समय में काम धंधा भी मिल गया। उनका जीवन वहाँ स्थिर होने लगा। किन्तु ...।” सारा रुकी, एक लंबी श्वास छोड़ी।
“किन्तु क्या?” शैल अधीर हो गया।
“भारत आए हिंदुओं का ऐसा भाग्य नहीं था। किसी को भी न घर मिला, न आश्रय मिला न ही कोई काम धंधा। खाली मस्जिदों, मदरसों और मकानों में प्रवेश करने से उन्हें रोका गया। जानते हो किसने रोका उन्हें?”
“नहीं।”
“गांधी ने, महात्मा गांधी ने। गांधी का तर्क था कि जब कभी भारत से पाकिस्तान गए मुसलमान पुन: भारत में आएंगे तो उन्हें उनकी संपत्ति का उपयोग करने में सरलता रहे इसलिए उन खाली स्थानों का उपयोग करने से महात्मा ने हिंदुओं को रोक दिया।
विस्थापित हिंदुओं के लिए ऊपर आभ और नीचे धरती। न खाने को कुछ न पीने को। न रहने को न सोने को। वर्षा, ठंड, गर्मी सभी को उन्हें सहन करना था। जैसे वे सभी जंगल के पशु हो ! जंगल के पशुओं के लिए तो सुरक्षित रहने के लिए जंगल की गुफ़ाएं भी होती हैं किन्तु इन अभागों के लिए गुफ़ाएं भी कहाँ?
महीनों बीत जाने के पश्चात उन्हें शरणार्थी शिविरों में आश्रय दिया गया। वहाँ उनके साथ पशुओं से भी निम्न स्तर का व्यवहार होता रहा। सभी उसे चुपचाप सहते रहे, अपने भाग्य पर रोते रहे। वह महात्मा हँसता रहा, विकृत आनंद लेता रहा। सभाएं करता रहा, मिथ्या वचनों से उपदेश देता रहा। हिंदुओं को मरने के लिए छोड़ दिया गया।
अपने ही देश में, अपनी ही भूमि पर, अपने ही महात्मा के कारण शरणार्थी बन गए। इन बातों की पीड़ा का हम केवल अनुमान ही कर सकते हैं। इनके पास पाकिस्तान में अखूट धन संपदा थी, व्यापार था, घर था, परिजन थे, मान सम्मान था, सुख था। सब छोड़कर आए थे। सब खो दिया था। और पाया क्या? भारत में आकर कष्ट, पीड़ा, वेदना, यातना, भूख, प्यास, अपमान।
ऐसे जीवन से मृत्यु श्रेयस्कर था। किसी भी नेता का रक्त उनकी यातनाओं से गरम नहीं होता था। रक्त जम गया था। स्वतंत्रता के आभासी चित्रों को देश के सामने प्रस्तुत कर सभी नेता उत्सव मना रहे थे। तभी, तभी ...।” सारा रुक गई।
“तभी क्या हुआ सारा जी? रुक क्यों गई?”