Antarnihit - 33 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 33

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अन्तर्निहित - 33

[33]

गहन सांस लेकर वह बोली, “यह गांधी का देश है। मेरी बात सुनकर तुम्हें बूरा लग सकता है। संभव है तुम मुझ से घृणा करोगे। मुझे छोड़कर चले जाओगे। अत: अब मैं मौन हो जाती हूँ।”

“आप निश्चिंत होकर कहिए। मैं विचलित नहीं होऊँगा।” शैल ने सारा को आश्वस्त किया। 

“तभी एक नर वीर ने शस्त्र उठाया। महात्मा को मार दिया”

“वह आतंकवादी नाथुराम गोडसे था। देश का प्रथम आतंकवादी।”

“शैल, तुम भी भ्रमित हो गए? वीर पुरुष को आतंकवादी कहना तुम्हारे देश का स्वभाव बन गया है।”

“सुना तो यही है कि नथुराम गोडसे आतंकवादी था।”

“वह आतंकवादी नहीं, वीर था। उससे बढ़कर विरपुरुष उस समय सारे भारत में कोई नहीं था। देश के शत्रु को मारनेवाला वीर होता है, आतंकवादी नहीं। शरणार्थियों की दुर्दशा देखकर उसका यौवन तड़प उठा। उसने समस्या की जड़ को ही समाप्त कर दिया। उस वीर पुरुष को भारत ने कभी सम्मान नहीं दिया। फांसी दे दी। सब के सब नपुंसक निकले।” सारा ने बात पूर्ण की। पानी पिया। आकाश को देखती रही। 

“इन सारी घटनाओं के विषय में मैंने सुना था। कहीं कहीं छुटपुट लिखा हुआ पढ़ा भी था। किन्तु यह बात इतनी गंभीर थी, इतनी पराकाष्ठा पर थी यह मुझे ज्ञात न था।”

“इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुम्हारे देश में सत्य इतिहास लिखना, उसे पढ़ना अपराध है। तुम तो पंजाब में रहते हो। क्या तुमने अपने पूर्वजों से यह सब सुना नहीं था?”

“नहीं। पंजाब हमारा घर नहीं है। हम दक्षिण भारत से हैं। यहाँ मैं कुछ वर्षों से ही आया हूँ।”

“यह भारतीय विडंबना है कि उत्तर वालों की चिंता दक्षिण वाले नहीं करते और दक्षिण वालों की चिंता उत्तर वाले नहीं करते।”

“आपका कहना सत्य हो सकता है किन्तु एक बात मुझे सता रही है। आप तो पाकिस्तानी हो, मुसलमान भी हो। आपको इन बातों की पीड़ा, इन बातों से पीड़ा आज क्यों हो रही है? आपने तो कुछ नहीं खोया है।” शैल ने बड़ा तीखा प्रश्न पूछा किन्तु उसके उस प्रश्न से सारा विचलित नहीं हुई। 

“मैं न तो पाकिस्तानी थी न ही मुसलमान।” सारा के शब्दों से शैल विचलित हो गया। 

“क्या?”

“मेरी कथा सुनना चाहोगे?” सारा ने शैल की आँखों में आँखें डालकर पूछा। 

“मेरी मां ने सिखाया है कि किसी के जीवन की व्यक्तिगत कथा में कभी रुचि नहीं लेना।”

“मेरी कथा सार्वजनिक है। हमारे देश की बात है। हम दोनों के देश की बात है। तब भी सुनना नहीं चाहोगे?”

शैल ने मौन सम्मति दी। 

“मैंने कहा था न कि हमारा परिवार पूर्व बंगाल में रहता था। 1927 में वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हम आकार बसे थे। 1947 तक बीस वर्ष की अवधि में हमारे परिवार ने व्यापार में प्रगति कर ली थी। सभी प्रकार के सुख थे। हमारा परिवार हिन्दू था, अपितु ब्राह्मण था। सारा नगर हमें पण्डितजी के नाम से सम्मान देता था। घर में पूजा होती थी, वेद, रामायण – महाभारत आदि ग्रंथों का पठन पाठन होता था। एक संत नगर से दूर अपने आश्रम में रहते थे। अनेक विद्यार्थी वहाँ भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया करते थे। बड़े ज्ञानी एवं निर्लेप व्यक्ति थे वह। 

विभाजन के समय उस संत ने हमें कहा था कि हमारे परिवार को भी भारत चले जाना चाहिए। मेरे परदादा ने कहा कि जहां वह संत रहेंगे वहीं हमारा परिवार रहेगा। संत ने हमें अपना आदेश मानने को कहा था किन्तु हमारे परिवार ने उनको नहीं माना। वहीं पाकिस्तान में ही हम रुक गए। समय व्यतीत होता रहा। विभाजन की प्रक्रिया पूर्ण हो गई थी। यहाँ सरकार बन गई थी, वहाँ भी। विस्थापितों का प्रवाह मंद होते होते रुक गया था। तभी प्रशासन और उनके गुंडों के द्वारा हिन्दू परिवारों की प्रताड़ना आरंभ हो गई। हमें देश छोड़कर भारत चले जाने को कहा गया। यदि वहाँ रहना हो तो इस्लाम को स्वीकार करने को कहा गया। आश्रम वाले गुरुजी ने पुन: कहा कि भारत चले जाओ। परदादा ने कहा, यदि गुरुजी भारत चलते हैं तो हम भी भारत चले जाएंगे। गुरुजी ने परदादा का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। 

1971 तक जैसे तेसे समय बित गया। बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान की पराजय वहाँ के हिन्दू परिवारों का दुर्भाग्य लेकर आया। परास्त पाकिस्तान हिन्दू परिवारों को यातना देकर बलात मुसलमान बनाने लगा। हमारे परिवार पर भी यह दुर्भाग्य आया। कुछ समय के विरोध के पश्चात मेरे दादा ने हिन्दू धर्म त्याग दिया। गुरु जी ने अपना धर्म नहीं त्यागा। उसने शस्त्र उठाया, विरोध किया किन्तु उसे मार दिया गया। एक एक अंग काट दिए गए। तथापि अंत समय तक अपने धर्म को, अपने ईश्वर को गुरुजी ने नहीं छोड़ा।”

“ओह ! यह कब की बात है। सारा जी?”

“वह वर्ष था 1973. मैं तब तीन साल की थी। मेरा नाम सरिता था। सारा हो गया।”

“इतना कष्ट? इतनी प्रताड़ना?”

“इतना पर्याप्त न था। हमारे व्यापार को हमसे छिन लिया गया। हमसे हमारा सारा धन लूट लिया। संपत्तियाँ छीनी गई। घर से निकाल दिया।”

“धर्म त्याग के पश्चात भी इतनी प्रताड़ना?”

“क्या करें? हम विवश थे। उस समय दादा को कहीं नौकरी करनी पड़ी। पिताजी भी कहीं काम करने लगे। एक समय जिनके यहाँ अनेक नौकर चाकर थे उन्हें किसी के यहाँ नौकरी करनी पड़ी। गुरुजी का आदेश दादा जी को तब समज आया था। यदि गुरुजी का आदेश मान लिया होता तो बात कुछ और होती। किन्तु तब तक समय आगे निकल गया था।”

“कितने कष्ट सहे हैं आप लोगों ने!”

“यातनाएं अभी पूरी नहीं हुई है। कहने को तो मैं वरिष्ठ पुलिस इंस्पेकटर हूँ किन्तु आज भी हिन्दू से मुसलमान बने परिवारों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जाता है। बात बात पर अपमान सहना पड़ता है। तभी तो मैं कह रही हूँ कि मैं कभी उस देश लौटकर नहीं जाना चाहूँगी।”

“किन्तु कभी न कभी तो जाना पड़ेगा ही।”

“शैल, वह मैं आप पर छोड़ती हूँ। केवल आपका ही आश्रय है। मुझे किसी भी तरह से यहाँ रोक लीजिए। मैं आपको हाथ जोड़ती हूँ।” सारा ने शैल के पाँव छु लिए। शैल पीछे हट गया। 

“ऐसा नहीं करते सारा जी। आप मेरी मां के समान हो। उठिए।”

सारा धरती पर बैठ गई। शैल दुविधा में वहीं खडा रहा। कुछ समय वह नदी को ताकता रहा। सहसा एक पंखी नदी पर उड़ता हुआ आकाश की तरफ गया। शैल की दृष्टि ने पंखी का पीछा किया। दृष्टि पश्चिम आकाश में सूर्य पर अटकी। सूरज अस्त होने को था। वह सारा के समीप गया, “सारा जी आप कहती थी न कि आज रात्री हम आश्रम में रहेंगे। चलो उठो। सूर्यास्त हो रहा है। हमें आश्रम की ओर चलना चाहिए।” 

सारा उठी, शैल चल पडा। सारा भी चलने लगी।