अनकही देहलीज़
भाग 1: अदृश्य रेखाएं
"साहब, चाय टेबल पर रख दी है।"
आदित्य ने अपनी फाइल से नज़रें नहीं हटाईं। खिड़की के बाहर शहर की शोर भरी शाम ढल रही थी। कमरे में रोशनी कम थी, पर वह अंधेरे में ही बैठने का आदी था। उसे उजाले से अब एक अजीब सी चिढ़ होने लगी थी, जैसे रोशनी उसकी आत्मा की दरारों को उघाड़ देगी।
"चीनी कम डाली है न, सावित्री?"
सावित्री ने कमरे के कोने में पड़े पुराने फूलदान को करीने से सजाते हुए कहा, "जी साहब, आपकी सेहत का ख्याल है मुझे। और वो... दवाई का डब्बा खाली होने वाला है। कल सुबह आते वक्त लेती आऊंगी।"
"मंगवा लूंगा। तुम जा सकती हो।"
सावित्री ठिठकी। उसने आदित्य के चेहरे की उन लकीरों को पढ़ने की कोशिश की जो पिछले कुछ महीनों में गहरी हो गई थीं। वह चेहरा जो कभी अखबारों की सुर्खियों में आत्मविश्वास के साथ चमकता था, अब एक बुझे हुए दीये की तरह था।
"साहब, खाना गर्म कर दिया है। आप समय पर खा लीजिएगा। मालकिन होतीं तो बहुत गुस्सा करतीं आपकी इस हालत पर..."
"सावित्री!" आदित्य की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, जैसे कोई कांच का बर्तन फर्श पर गिरा हो। "कहा न, तुम जा सकती हो। मुझे अकेले रहने दो।"
सावित्री ने चुपचाप सिर झुकाया। उसकी चूड़ियों की खनक कमरे के सन्नाटे में एक अजीब सी हलचल पैदा कर गई। वह उस अदृश्य देहलीज़ को जानती थी जिसे पार करने की अनुमति उसे नहीं थी। वह चुपचाप बाहर निकल गई।
शहर के दूसरी तरफ, एक तंग बस्ती के छोटे से कमरे में धुएं और पसीने की गंध बसी थी। लालटेन की मद्धम रोशनी में सावित्री अपनी फटी हुई साड़ी के पल्लू को ठीक कर रही थी। उसका हाथ आज भी कांप रहा था जब उसने आदित्य के कमरे का वह बंद कोना देखा था।
"मां, बाबू फिर से वही कर रहे हैं," सात साल के गोलू ने कोने में दुबकते हुए फुसफुसाया।
सावित्री ने दीवार की तरफ देखा, जहाँ उसके पति रामू की परछाईं शराब के नशे में झूल रही थी। रामू बुदबुदा रहा था, गालियां दे रहा था—किस्मत को, शहर को और खुद को।
"चुप कर गोलू, सो जा। कंबल ओढ़ ले," सावित्री ने उसे सीने से लगाते हुए कहा।
"वो साहब के घर में बहुत रोशनी होती है न मां? वहां सब खुश रहते होंगे? वहां बाबू जैसे लोग नहीं होते होंगे?" गोलू ने मासूमियत से पूछा।
सावित्री की आंखों में एक फीकी चमक आई। "रोशनी तो बहुत है बेटा, पर खुशियां... खुशियां शायद वहां भी कमरों में बंद हैं। वहां सन्नाटा बहुत गहरा है। इतना गहरा कि वहां चीखें भी बाहर नहीं आतीं।"
"क्या सन्नाटा भी बोलता है मां?"
"बहुत तेज़ बोलता है, गोलू। इतना तेज़ कि इंसान को खुद की आवाज़ सुनाई देना बंद हो जाती है। तू सो जा, कल स्कूल जाना है।"
आदित्य ने चाय का प्याला उठाया। चाय ठंडी हो चुकी थी, बिल्कुल उसके जीवन की तरह। उसने प्याला वापस रख दिया और अलमारी के उस खाने की तरफ बढ़ा जिसे उसने हफ़्तों से नहीं खोला था। वहां एक पुरानी डायरी और एक टूटी हुई नीली चूड़ी रखी थी।
"तुमने कहा था कि तुम कभी नहीं जाओगी," आदित्य की आवाज़ खामोश कमरे में गूंजी।
अतीत की एक स्मृति बिजली की तरह कौंधी। वह बारिश वाली रात, अस्पताल का गलियारा और वह सफेद चादर। आदित्य ने अपनी आंखें जोर से बंद कर लीं। उसे लगा जैसे समय पीछे की ओर भाग रहा है। वह वर्तमान में खड़ा था, लेकिन उसका मन उस बीते हुए कल की गलियों में भटक रहा था।
तभी उसे याद आया कि सावित्री ने आज सफाई करते वक्त उस अलमारी के हैंडल को साफ किया था। क्या उसने उसे देख लिया था? क्या उस साधारण सी औरत ने उस दर्द को सूंघ लिया था जिसे वह दुनिया भर के इत्रों से छिपाने की कोशिश कर रहा था?
सुबह की पहली किरण के साथ सावित्री फिर उसी बड़ी कोठी के फाटक पर खड़ी थी। हाथ में एक छोटा सा थैला था, जिसमें उसके खुद के फटे हुए सपने और घर की जिम्मेदारियां बंधी थीं। वह फाटक पार करते ही एक दूसरी दुनिया में कदम रखती थी—जहाँ फर्श मखमली थे पर दिल पथरीले।
"देर हो गई आज?" दरबान ने खैनी थूकते हुए टोक दिया।
"रात भर नींद नहीं आई भैया, बस ज़रा आंख लग गई थी," सावित्री ने धीमे से कहा और अंदर चली गई।
जब वह आदित्य के कमरे में दाखिल हुई, तो देखा कि वह वहीं कुर्सी पर सो गए थे। हाथ में वही पुरानी डायरी थी। फर्श पर दवाइयों की कुछ खाली स्ट्रिप्स बिखरी पड़ी थीं। सावित्री ने झुककर उन्हें उठाना शुरू किया। तभी उसकी नज़र एक फटे हुए कागज़ पर पड़ी जिस पर 'क्षमा' लिखा था।
सावित्री का हाथ कांप गया। उसने जल्दी से कागज़ वापस रखा। उसे डर लगा कि कहीं वह उस राज़ का हिस्सा न बन जाए जिसे ढोने की ताकत उसमें नहीं थी।
"क्या ढूंढ रही हो?"
आदित्य की आवाज़ अचानक गूंजी। वह जाग चुके थे। उनकी आँखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वह पूरी रात नहीं सोए।
"कुछ नहीं साहब, बस सफाई... ये कागज़ गिर गए थे।"
"सफाई सिर्फ फर्श की होती है सावित्री, आत्मा की नहीं," आदित्य ने कुर्सी छोड़ते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था। "आज नाश्ता मत बनाना। मेरा मन नहीं है। मैं बाहर जा रहा हूँ।"
"साहब, खाली पेट काम पर जाना ठीक नहीं। मैंने दलिया चढ़ा दिया है। बस दो मिनट लगेंगे।"
आदित्य ने उसे डांटने के लिए मुंह खोला, पर सावित्री की स्थिर नज़रों ने उसे खामोश कर दिया। उन नज़रों में एक ऐसी ममता थी जो केवल एक मां या एक अनुभवी दुखियारी में हो सकती थी। वह हार गया। वह जानता था कि इस विशाल घर में सावित्री ही वह एकमात्र कड़ी थी जो उसे वास्तविकता से जोड़े हुए थी।
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"साहब ने आज फिर कुछ नहीं खाया?" शाम को जब सावित्री घर लौटने लगी, तो पुराना माली ने पूछा।
"खाया तो है, पर जो उन्हें चाहिए, वो मेरे पास नहीं है भैया," सावित्री ने भारी मन से कहा।
"तू बेकार में परेशान होती है सावित्री। हम नौकर हैं, हमारा काम सफाई करना और रोटी बनाना है। बड़े लोगों के दुखों का बोझ हम गरीब उठाएंगे तो दब जाएंगे।"
सावित्री ने अपने हाथ की हथेलियों को देखा। "दुख की कोई जाति नहीं होती, काका। चाहे कोठी हो या झोपड़ी, जब रूह रोती है तो आवाज़ एक जैसी ही निकलती है। बस कोठी वाले उसे छुपाना जानते हैं।"
उसने कोठी की ऊंची मीनारों की तरफ देखा। वहां की रोशनी अब उसे चकाचौंध नहीं करती थी, बल्कि उसे उन अंधेरों की याद दिलाती थी जो हर महंगे पर्दे के पीछे छिपे होते हैं। उसे डर था कि कहीं वह सन्नाटा उसे भी अपने आगोश में न ले ले।
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रात के दो बज रहे थे। आदित्य के मोबाइल पर एक पुराना वीडियो चल रहा था। एक खिलखिलाती हुई औरत की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी। आदित्य ने फोन को जोर से सीने से लगा लिया।
उसने दराज खोली। वह सावित्री की सफाई से चिढ़ गया था। उसे अपनी गंदगी, अपने बिखराव से प्यार हो गया था। पर दराज के कोने में उसे एक छोटी सी पुड़िया मिली।
उसने उसे खोला। उसमें थोड़ी सी भभूति और एक हाथ से लिखा नोट था।
'ईश्वर सब ठीक करेगा साहब। हारना गुनाह है।'
आदित्य उस छोटे से पुर्जे को देखता रहा। वह एक सफल तार्किक इंसान था, इन सब बातों पर यकीन नहीं करता था। पर उस वक्त, उस अंधेरी रात में, उसे लगा जैसे किसी ने डूबते हुए को तिनके का सहारा दिया हो।
उधर बस्ती में, सावित्री रामू के हाथ से शराब की बोतल छीनने की कोशिश कर रही थी। रामू ने उसे धक्का दिया और वह दीवार से जा टकराई। उसके माथे से खून की एक पतली धार निकली।
दो अलग दुनिया, दो अलग संघर्ष। एक के पास सब कुछ होकर भी मौत की कामना थी, और दूसरे के पास मौत के साये में भी जीने की ज़िद। दोनों एक-दूसरे के सच से अनजान थे, फिर भी एक अनकही देहलीज़ पर खड़े थे जहाँ दर्द साझा था।
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सावित्री ने जिस विश्वास के साथ आदित्य के लिए वह नोट छोड़ा, क्या वह आदित्य के जीवन में बदलाव ला पाएगा या उसकी मुश्किलें और बढ़ा देगा?
कमेंट में लिखकर बताइए। और अगले भाग का इंतजार कीजिए...❣️