आज मेडिकल कॉलेज की छुट्टी थी।
सुबह से ही सावी को अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था। कई दिनों बाद ऐसा दिन आया था जब न क्लास थी, न प्रैक्टिकल, न अचानक लग जाने वाली टेस्ट की टेंशन। उसने बाल खुला छोड़ दिए, हल्का सा कुर्ता पहना और बालकनी में खड़ी होकर धूप को चेहरे पर गिरने दिया।
फोन वाइब्रेट हुआ।
अथर्व।
“फ्री है?” उसने कॉल उठाते ही पूछा।
“आज तो पूरी तरह,” सावी मुस्कुराई।
“तो तैयार हो जा। दोपहर में निकल रहे हैं।”
“कहाँ?”
“सरप्राइज़।”
“अथर्व…” सावी ने शक भरी आवाज में कहा।
“टेंशन मत ले। बस आज कुछ देर के लिए सब भूल जा।”
सावी ने हामी भर दी।
उसे नहीं पता था कि अथर्व ने पिछले एक हफ्ते से क्या तैयारी कर रखी थी।
दोपहर — कैफ़े “ब्लू ऑर्किड”
शहर के शांत कोने में बना छोटा सा लेकिन बेहद खूबसूरत कैफ़े। बाहर कांच की दीवारें, अंदर हल्की पीली रोशनी, और बैकग्राउंड में धीमा म्यूज़िक।
अथर्व पहले ही पहुँच चुका था।
उसने घड़ी देखी।
हाथ हल्के कांप रहे थे।
वो आमतौर पर आत्मविश्वासी था — क्लास में टॉपर, डिबेट में विनर, सबका पसंदीदा। लेकिन आज उसके सीने में धड़कनें कुछ ज्यादा ही तेज थीं।
वेटर उसके पास आया।
“सर, सब सेट है।”
अथर्व ने सिर हिलाया।
कैफ़े के एक कोने में छोटी सी टेबल सजाई गई थी। सफेद टेबलक्लॉथ, मोमबत्ती, और फूलों की हल्की सजावट। उसने पूरा सेक्शन दो घंटे के लिए बुक कराया था ताकि कोई बीच में खलल न डाले।
दरवाज़ा खुला।
सावी अंदर आई।
सूरज की रोशनी पीछे से आती हुई उसके चारों ओर हल्का सा चमकदार घेरा बना रही थी। वो इधर-उधर देखती हुई अंदर बढ़ी।
“अथर्व?”
“यहाँ,” उसने हाथ उठाया।
सावी उसके पास पहुँची और चारों तरफ देखा।
“ये सब…?”
“बस… सोचा आज छुट्टी है। कुछ अच्छा खा लेते हैं।”
सावी मुस्कुरा दी।
“इतनी तैयारी? कोई खास बात है क्या?”
अथर्व ने नज़रें चुरा लीं।
“देखते हैं।”
दोनों बैठ गए।
कुछ देर तक सामान्य बातें होती रहीं — कॉलेज, प्रोफेसर, आने वाली परीक्षाएँ। लेकिन अथर्व की आवाज़ में हल्की घबराहट थी, जिसे सावी महसूस कर रही थी।
“तू ठीक है ना?” उसने पूछा।
“हाँ,” उसने पानी का घूंट लिया, “बस… थोड़ा नर्वस हूँ।”
“नर्वस? तू?” सावी हँस पड़ी।
“हाँ… कभी-कभी मुझे भी होता है।”
कुछ सेकंड की चुप्पी।
म्यूज़िक बदलकर और धीमा हो गया।
अथर्व ने गहरी सांस ली।
“सावी…”
उसकी आवाज़ अब पहले जैसी हल्की नहीं थी। उसमें गंभीरता थी।
सावी ने उसकी तरफ देखा।
“हम कब से दोस्त हैं?”
“पहले साल से,” उसने मुस्कुराकर कहा, “जब तूने मुझे एनाटॉमी में बचाया था।”
“और तब से… मैं हमेशा तेरे साथ रहा हूँ।”
“मुझे पता है,” सावी की आँखें नरम हो गईं।
अथर्व ने जेब में हाथ डाला।
उसकी उंगलियाँ छोटे से डिब्बे को छू रही थीं।
दिल जैसे कानों में धड़क रहा था।
“सावी… पिछले कुछ दिनों में जो हुआ… उसने मुझे एहसास कराया कि जिंदगी कितनी अनिश्चित है। कब क्या हो जाए… पता नहीं।”
सावी की मुस्कान हल्की पड़ गई।
“और उस अनिश्चितता में एक चीज़ है जो मेरे लिए हमेशा साफ रही…”
उसने धीरे से डिब्बा निकाला।
सावी की सांस अटक गई।
अथर्व खड़ा हो गया।
कैफ़े में अब सिर्फ उनकी टेबल पर रोशनी थी।
वो उसके सामने आकर घुटनों के बल बैठ गया।
“मैंने कभी जल्दी नहीं की। क्योंकि मैं चाहता था तू खुद समझे… बिना दबाव के। लेकिन आज… मैं छुपाना नहीं चाहता।”
उसने डिब्बा खोला।
अंदर साधारण लेकिन खूबसूरत रिंग थी।
“सावी… मैं तुझसे प्यार करता हूँ।”
शब्द सीधे थे। बिना बनावट के।
“मैं तेरे साथ हर डर में खड़ा रहना चाहता हूँ। हर मुस्कान में, हर परेशानी में। अगर कभी तुझे दुनिया से लड़ना पड़े… मैं तेरे साथ रहूँगा। अगर कभी तुझे सिर्फ चुप बैठना हो… तब भी।”
उसकी आवाज़ हल्की काँपी।
“क्या तू मेरे साथ… जिंदगी भर चलना चाहेगी?”
सावी स्तब्ध खड़ी थी।
उसने कभी इस पल को इस तरह नहीं सोचा था।
अथर्व उसका सबसे सुरक्षित हिस्सा था। उसके साथ वो सहज थी, हँसती थी, लड़ती थी, रोती थी।
लेकिन…
दिल के किसी कोने में एक और नाम था।
रेयांश।
वो रहस्य… वो चुप्पी… वो अजीब सा खिंचाव।
सावी की आँखें नम हो गईं।
“अथर्व…”
वो उसके सामने झुक गई ताकि वो खड़ा हो जाए।
“तू मेरे लिए बहुत मायने रखता है।”
अथर्व की आँखों में उम्मीद चमकी।
“लेकिन…”
वो शब्द जैसे हवा में भारी होकर गिरा।
“मुझे खुद को समझने का समय चाहिए।”
अथर्व के चेहरे पर हल्की सी चोट आई… लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
“मतलब… ना नहीं है?”
सावी ने सिर हिलाया।
“ना नहीं है। लेकिन हाँ भी अभी नहीं है।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर अथर्व धीरे से उठा।
“मैं इंतज़ार कर सकता हूँ।”
उसने रिंग वापस डिब्बे में रख ली।
“जब तक तुझे यकीन न हो… मैं कोई जल्दबाज़ी नहीं करूँगा।”
सावी की आँखों से एक आँसू गिरा।
“तू इतना अच्छा क्यों है?”
अथर्व हल्का हँसा।
“क्योंकि मैं तुझसे सच में प्यार करता हूँ।”
दोनों बैठे ही थे कि कैफ़े के बाहर अचानक एक काली गाड़ी आकर रुकी।
अंदर बैठे आदमी की नजर सीधी कांच के पार उस टेबल पर थी।
उसने फोन मिलाया।
“लड़की अकेली नहीं है। लड़का साथ है।”
दूसरी तरफ से जवाब आया —
“कोई फर्क नहीं पड़ता।”
कैफ़े के अंदर…
अथर्व और सावी को अभी भी लगता था कि ये बस एक खूबसूरत दिन है।
उन्हें नहीं पता था —
आज का ये फैसला…
आने वाले तूफ़ान की शुरुआत था।