"सफलता की दौड़ में खो न जाए जीवन का रस,
जीना ही ईश्वर है, यही है असली सुख-विलास।"
सफलता और आध्यात्मिक आनंद: दो विपरीत धाराएँ
संसार की सफलता और आध्यात्मिक जीवन की दिशा बुनियादी रूप से अलग हैं।
सफलता: शिक्षा, व्यवसाय, धन-संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि “बाहर” की वस्तुओं में खोजी जाती है। यहाँ बुद्धि, विश्लेषण, योजना, और दूसरों से तुलना प्रमुख है। अक्सर सफलता संघर्ष, प्रतिस्पर्धा और तनाव का कारण बनती है।
आध्यात्मिकता: आनंद, शांति, प्रेम, आत्मस्वीकृति, करुणा—यह सब “भीतर” से ही उदित होता है। यहाँ ह्रदय, भावना, मौन और साक्षीभाव का महत्व है, जहाँ कोई तुलना या प्रतिस्पर्धा नहीं—केवल अस्तित्व के साथ सहज मिलन है।
आज की धार्मिकता—समस्या कहाँ है?
वर्तमान में धर्म भी बाजार और प्रतियोगिता का हिस्सा बन गया है—धार्मिक कर्मकांड, प्रवचन, महान स्थिति दिखाने की होड़, इनाम या चमत्कार की अपेक्षा।
हृदय, संगीत, प्रेम की जगह अब सिद्धांत, नियम, और प्रदर्शन छा गया है; इससे परिणामस्वरूप सच्चा आनंद, सहजता, “लीला” यानी जीवन का खेल दूर होता जा रहा है।
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