चेहरे से पता नहीं चलता दिल के गहरे ज़ख्मों का,
ये मुस्कान तो बस एक तरीका है दर्द छुपाने का।
आँखों में अक्सर ठहरा रहता है खामोश सा समंदर, हर किसी को हुनर नहीं होता ग़म पहचान पाने का।कोई साहिल पर खड़े होकर क्या समझे लहरों का दर्द,उसे क्या पता बोझ क्या होता है अंदर डूब जाने का।
हम भी हँसते हैं महफ़िल में सबके साथ मगर,
अंदर चलता रहता है सिलसिला टूटते जाने का।
हर शख्स यहाँ पूरा नहीं होता जैसा दिखता है,
किसी को शौक नहीं होता यूँ अंदर से बिखर जाने का। कुछ ज़ख्म आवाज़ नहीं करते, बस चुपचाप रहते हैं, फिर भी वक़्त लगता है दिल को फिर से संभल जाने का।