तथास्तु कह दो माँ
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आज बसंत पंचमी है
इतना तो मुझे भी पता है
कि आज माँ शारदे का दिवस विशेष है।
पर शायद आपको पता नहीं, जो अजूबा हो गया
मेरा मित्र यमराज मुझसे ख़फ़ा हो गया
और माँ शारदे की चौखट पर पहुँच गया।
सम्मान से माँ को शीष झुकाकर गुहार लगाया
माँ मुझ पर भी उपकार कर दो,
तनिक तो हमें भी ज्ञान को वर दे दो।
पर आपको तो वीणा बजाने से ही फुर्सत नहीं है।
कम से कम अपनी वीणा को भी तनिक विश्राम दे दो।
मैं यमराज द्वार पर आकर खड़ा हूँ
मुझे भी तो अपना दर्शन दे दो,
मम शीश पर अपना हाथ रख दो
मैं भी कविता लिखना और कवि बनना चाहता हूँ
इसके लिए भी कोई मंत्र दे दो।
अब ये मत कहना माँ! कि अपने यार को गुरु बना लो
लेकिन उसे भी सौ-पचास ग्राम सद्बुद्धि दे दो
आपका मन करे तो दो-चार चाँटे भी जड़ दो।
वो समझता है कि मैं मूढ़ अज्ञानी हूँ
कविता लिखना तो दूर
कवि बनने के योग्य तो बिल्कुल भी नहीं हूँ
वो मेरा यार है, इसलिए बर्दाश्त करता हूँ
वरना आपको भी पता है
कि मैं उसका तिया- पाँचा कर सकता हूँ।
यमराज की पीड़ा सुन माँ शारदे पिघल गईं,
वीणा रखकर द्वार पर आ गईं,
और आसन छोड़ चौखट पर आ गईं।
अपने सामने माँ को देख
यमराज किंकर्तव्यविमूढ़ हो सब कुछ भूल गया,
माँ शारदे के चरणों में लोट गया,
माँ मुझे माफ़ कर दो
मेरे यार को अद्भुत ज्ञान, उत्तम स्वास्थ्य
और वाणी विवेक का वर दे दो।
मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए,
बस! मेरे यार को वैश्विक पहचान
और हमारी यारी को अमरता का वरदान दे दो,
जो भी शिकवा शिकायत किया मैंने,
उसे मेरी मूर्खता मान नजरंदाज कर दो,
पर नाराज़ बिल्कुल न होना माते
अपने यार की सलाह पर ही तो मैं यहाँ आया
और आपके दर्शनों का सौभाग्य पाया हूँ,
इसके लिए यार को माफी के साथ
हम दोनों को अतुलित वर दे दो,
बस! ज्यादा नहीं थोड़ा सा उपकार कर दो,
अपने वरद पुत्र पुत्रियों के संग हमें भी भव से तार दो माँ, कविता भले ही मेरा यार लिखे
पर कवि कहलाने का सिर्फ मुझे ही
एकाधिकार और आशीर्वाद दे दो,
मेरी प्रार्थना पर सिर्फ एक बार तथास्तु कह दो,
हम दोनों मित्रों का नमन वंदन स्वीकार कर लो।
सुधीर श्रीवास्तव