क्या है सिकुड़ता शहर?
अरे क्या है सिकुड़ता शहर?
एक कमरा है एक मेज है एक फोन है
हाथ में दुनिया है, दुनिया की खबर है
खुद से बेखबर ,ये खबर की दुनिया है
है एक सुंदर शहर जिसमें दीवारें है
रंगीन पर्दे है ढेर भर किताबें है
चार फूलों का फूलदान पूरा शहर महकता है।
मधुर आवाजों भरा रेडियो दिन भर चहकता है।
कभी पन्ने उलटते दिन कभी रात हो जाती हैं।
मगर कमबख्त धूप कभी शहर तक न आती है। तिरछी बरसती बूंदे कभी खिड़की से टकराती है।पर शहर और उसके लोगों को कहां भीगाती है ।
भीड़ बहुत है, लेकिन शहर में कोई आते नहीं। रेडियो चालू है पर लोग कुछ कह पाते नहीं अखबार है पर किसी को सुना पाते नहीं
कदमों की आहटें गलियों में, पर कोई ठहर जाते नहीं।
दरवाज़े रोज़ खुलते हैं, पर लोग अंदर आते नहीं
हां यही तो है सिकुड़ता शहर
जहां आशना कभी टकराते नहीं।।
आस्था रावत